किस्को़ जिले की समृद्ध जैव विविधता और पारंपरिक कृषि विरासत को संरक्षित करने के लिए कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) लोहरदगा एवं राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो रांची ने संयुक्त पहल शुरू की है. शुक्रवार को वैज्ञानिकों के एक दल ने किस्को प्रखंड के विभिन्न गांवों का भ्रमण कर किसानों द्वारा संरक्षित की जा रही दुर्लभ फसलों और बीजों का अवलोकन किया. पीढ़ी दर पीढ़ी सुरक्षित हैं धान की दर्जनों किस्में : केवीके की वरीय वैज्ञानिक डॉ किरण सिंह ने बताया कि लोहरदगा का वन क्षेत्र कृषि दृष्टिकोण से विशेष महत्व रखता है. यहां के किसान पीढ़ी दर पीढ़ी जीरा फूल, काला जीरा, करहनी, गोपाल भोग, मणिपुरी और कलमदानी जैसी दर्जनों पारंपरिक धान की किस्मों को सहेज कर रखे हुए हैं. इन किस्मों में स्थानीय जलवायु के प्रति अनुकूलता और विशेष स्वाद जैसे गुण मौजूद हैं. इसके अलावा मड़ुआ, सरगुजा, गोंदली और कुल्थी जैसे लुप्तप्राय बीजों का भी संरक्षण किया जा रहा है. 50 साल पुराने बारहमासी कटहल को बचाने की अपील : वैज्ञानिकों का दल देवदरिया पंचायत के उलदाग गांव पहुंचा, जहां 50 वर्ष पुराना ””””बारहमासी कटहल”””” का वृक्ष मिला. इसके साथ ही बारहमासी सहजन और कम समय में तैयार होने वाली अरहर की खेती देख वैज्ञानिक गदगद हुए. डॉ किरण सिंह ने ग्रामीणों और मुखिया से इस ऐतिहासिक कटहल वृक्ष की जड़ों की घेराबंदी व मिट्टी भराई कर इसे बचाने की अपील की. मौके पर डॉ एनएस पवार और डॉ मोनू कुमार ने कहा कि यह संरक्षण भविष्य की खाद्य सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है. इस अवसर पर पहान बालकृष्ण खेरवार सहित कई ग्रामीण उपस्थित थे.
किस्को के खेतों में लहलहा रहे करहनी और जीरा फूल जैसे दुर्लभ धान
किस्को के खेतों में लहलहा रहे करहनी और जीरा फूल जैसे दुर्लभ धान
