प्रतिवर्ष 25 लाख का राजस्व के बावजूद, एक बस पड़ाव नहीं है

लोहरदगा : 17 मई 1983 को लोहरदगा जिला बना, लेकिन जिला बनने के इतने वर्षों के बाद भी लोहरदगा में एक सुव्यवस्थित बस पड़ाव नहीं है, इसके कारण यात्रियों को परेशानियों का सामना करना पड़ता है. रेलवे की जमीन पर नगर परिषद द्वारा चहारदीवारी कर बस पड़ाव का रूप दिया गया है, लेकिन वहां बुनियादी […]

लोहरदगा : 17 मई 1983 को लोहरदगा जिला बना, लेकिन जिला बनने के इतने वर्षों के बाद भी लोहरदगा में एक सुव्यवस्थित बस पड़ाव नहीं है, इसके कारण यात्रियों को परेशानियों का सामना करना पड़ता है. रेलवे की जमीन पर नगर परिषद द्वारा चहारदीवारी कर बस पड़ाव का रूप दिया गया है, लेकिन वहां बुनियादी सुविधाओं का भी अभाव है. हालांकि इस बस पड़ाव से नगर परिषद प्रति वर्ष 25 लाख रुपया से ऊपर राजस्व वसूलता है, लेकिन सुविधा के नाम पर कुछ खास नहीं है.
एक तो स्थान काफी छोटा है और वहां वेतरतीब तरीके से बनी दुकान अलग परेशानी का कारण है. जगह की कमी के कारण अक्सर कई वाहन सड़क किनारे खड़ा होने के लिए विवश होते हैं, जिससे सड़क जाम की समस्या उत्पन्न होती है. लोहरदगा शहर में बस पड़ाव की मांग काफी पहले से की जा रही है, लेकिन इस दिशा में अब तक कोई प्रगति नहीं होने से जनता में निराशा देखी जा रही है.
हालांकि बस पड़ाव के लिए नगर विकास विभाग द्वारा राशि भी नगर परिषद को उपलब्ध करायी, लेकिन नगर परिषद लोहरदगा बस पड़ाव के लिए एक अदद जमीन की तलाश नहीं कर पाया. सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि शहर के विकाश के प्रति अधिकारी एवं जनप्रतिनिधी कितने गंभीर है. लोग बताते है कि जनप्रतिनिधियों की उदासीनता के कारण ही लोहरदगा में बस पड़ाव का निर्माण नहीं हो पाया है, क्योंकि लोहरदगा के बाद गुमला जिला बना और वहां पूर्व सांसद ललित उरांव के नाम पर एक सुव्यवस्थित बस पड़ाव भी है.

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