बेतला (लातेहार). बेतला सहित पलामू टाइगर रिजर्व (पीटीआर) के आसपास के ग्रामीण इलाकों में पिछले कुछ दिनों से हो रही लगातार मानसूनी बारिश ने किसानों की तकदीर बदल दी है. इस वर्ष क्षेत्र में शत-प्रतिशत खरीफ फसल होने की प्रबल उम्मीद जताई जा रही है. लंबे समय से सूखे की मार झेल रहे इस कछारी और जंगली क्षेत्र के किसानों के चेहरे अब खुशी से खिल उठे हैं. खेतों में चारों तरफ फैली हरियाली इस बात की गवाही दे रही है कि इस बार अन्नदाताओं की मेहनत रंग लाने वाली है.
पूंजी और मेहनत हुई कारगर
बेतला, कुचिला, पोखरी,केचकी, कुटमू,छिपादोहर सहित पूरे बरवाडीह ,गारू, महुआडांड़ प्रखंड के आसपास के गांवों के किसानों का कहना है कि शुरुआती दौर में मौसम की बेरुखी देखकर वे बेहद डरे हुए थे. लेकिन हिम्मत न हारकर उन्होंने खेतों में जो पूंजी लगाई और दिन-रात एक करके जो मेहनत की, वह अब पूरी तरह कारगर साबित हो रही है. स्थानीय किसानों के अनुसार, "हमने कर्ज लेकर और अपनी जमा-पूंजी दांव पर लगाकर खाद-बीज का इंतजाम किया था. भगवान ने हमारी सुन ली और इस लगातार हो रही बारिश ने हमारी फसलों को नया जीवनदान दे दिया है.
सूखे के डर से सहमे थे किसान
गौरतलब है कि मानसून के शुरुआती हफ्तों में पलामू प्रमंडल के इस हिस्से में सामान्य से बहुत कम बारिश दर्ज की गयी थी. पीटीआर के वन्यजीवों के साथ-साथ स्थानीय आबादी भी पानी के संकट से जूझने लगी थी. किसानों को पक्का अंदेशा हो गया था कि इस साल भी पलामू टाइगर रिजर्व को सूखे का सामना करना पड़ेगा और उनकी लागत पूरी तरह डूब जायेगी. सिंचाई के सीमित साधनों वाले इस पथरीले क्षेत्र में पूरी खेती केवल और केवल मानसूनी बारिश पर टिकी होती है. ऐसे में बारिश न होने की आशंका ने हर परिवार की रातों की नींद उड़ा दी थी. हालांकि, अगस्त के उत्तरार्ध से शुरू हुआ बारिश का सिलसिला सितंबर की शुरुआत तक लगातार जारी है, जिसने सूखे के सारे कयासों को पूरी तरह धो डाला है.
किसानों को भारी पछतावा
मौसम के इस बदले मिजाज के बीच क्षेत्र में एक दूसरा पहलू भी देखने को मिल रहा है. सूखे की आशंका को सच मानकर कुछ किसानों ने अत्यधिक सावधानी बरती और समय पर धान के बिचड़े (नर्सरी) तैयार नहीं किये. उन्हें लगा कि पानी के अभाव में बिचड़े सूख जायेंगे और पैसे बर्बाद हो जाएंगे. अब जब मौसम खेती के लिए शत-प्रतिशत अनुकूल हो चुका है और खेतों में पर्याप्त पानी जमा है, तब इन किसानों के पास रोपाई के लिए बिचड़े उपलब्ध नहीं हैं. बेतला के आसपास के गांवों के ऐसे दर्जनों किसानों को अब अपनी इस चूक पर भारी पछतावा हो रहा है. बिचड़ों के अभाव में वे चाहकर भी अपने खेतों में धान की रोपाई नहीं कर पा रहे हैं और उन्हें इस सुनहरे मौके को हाथ से गंवाने का मलाल साफ तौर पर सता रहा है.
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फसलों से लहलहाए खेत
इस समय पलामू टाइगर रिजर्व के जंगलों से सटे खेतों का नजारा बेहद विहंगम और खूबसूरत हो गया है. चारों तरफ सिर्फ और सिर्फ हरियाली नजर आ रही है. धान की फसलों के साथ-साथ ऊंचे और टांड़ वाले खेतों में मकई, अरहर और तिल की फसलें पूरी तरह लहलहा रही हैं. कृषि विभाग के स्थानीय अधिकारियों और विशेषज्ञों का कहना है कि यह बारिश इन चारों फसलों के लिए किसी अमृत से कम नहीं है. विशेषकर अरहर और तिल जैसी नकदी फसलों के लिए यह मौसम बेहद फायदेमंद माना जा रहा है. यदि आने वाले कुछ हफ्तों तक मौसम का यही रुख बना रहा, तो पलामू टाइगर रिजर्व के इस सुदूरवर्ती क्षेत्र में खरीफ उत्पादन के पिछले कई सालों के रिकॉर्ड टूट जाएंगे. इस अनुकूल कृषि चक्र ने न केवल किसानों की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होने की उम्मीद जगाई है, बल्कि स्थानीय बाजार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में भी नई जान फूंक दी है.
