बरवाडीह़ प्रखंड के छिपादोहर क्षेत्र के जीतू मिस्त्री आज किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं. वे महज एक बढ़ई (कारपेंटर) नहीं, बल्कि जिले की सांस्कृतिक पहचान बन चुके हैं. लकड़ी पर बेमिसाल नक्काशी करने में माहिर 75 वर्षीय जीतू इकलौते ऐसे कलाकार हैं, जो अपनी छेनी और हथौड़ी के प्रहार से बेजान लकड़ी में जीवन उतार देते हैं. उनकी बनायी शेर, बाघ, हाथी, सांप, हिरण और बाइसन जैसी वन्यजीवों की आकृतियां इतनी जीवंत लगती हैं कि देखने वाले ठिठक जाते हैं. मंत्रियों व अधिकारियों को भी भाती है इनकी कला : उनकी बारीकी और अद्भुत कल्पनाशक्ति का प्रमाण उनकी बनायी देवी-देवताओं की प्रतिमाएं भी हैं. जीतू की कारीगरी की ख्याति पलामू प्रमंडल ही नहीं, बल्कि दूर-दराज के क्षेत्रों तक फैली है. झारखंड के प्रथम वन एवं पर्यावरण मंत्री स्वर्गीय यमुना सिंह भी उनकी कला के कायल थे और सार्वजनिक मंचों से उनकी प्रशंसा कर चुके थे. वर्तमान में भी जिला प्रशासन के कई आला अधिकारी उनके बनाये लकड़ी के उत्पादों के मुरीद हैं. वर्षों के समर्पण ने उन्हें क्षेत्र का सबसे सम्मानित शिल्पकार बना दिया है. 60 साल से संजो रहे विरासत, पर सरकारी उपेक्षा का है मलाल : जीतू मिस्त्री बताते हैं कि वे पिछले 60 वर्षों से अपनी कला के माध्यम से स्थानीय परंपरा और विरासत को जीवित रखे हुए हैं. वे याद करते हैं कि जब वन विभाग का सरकारीकरण नहीं हुआ था, तब बड़े अधिकारी उनके पास से कलाकृतियां बनवाने आते थे. हालांकि, इतनी लंबी साधना और कई मंचों पर सम्मानित होने के बावजूद उन्हें इस बात का मलाल है कि अब तक सरकारी स्तर पर उन्हें वह विशिष्ट सम्मान या प्रोत्साहन नहीं मिला, जिसके वे हकदार हैं.
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