घघरी नदी में सालों भर पानी रहता है. इसे लेकर लातेहार प्रखंड के तरवाडीह-नरेशगढ़ ग्राम के आठ ग्रामीणों ने इस नदी की धारा को अपने खेतों तक ले जाने की निश्चय किया, तो अन्य ग्रामीण इसे इन लोगों की सनक बता कर मजाक उड़ाया, लेकिन जब इन्होंने ग्रामीणों ने अपनी इस कार्य योजना को समझाया, तो सभी प्रभावित हुए और उनके साथ हो लिये.
लातेहार : कहते हैं अगर मन में कुछ करने की ललक एवं दृढ़ इच्छा शक्ति हो, तो सीमित संसाधन भी सफलता के आड़े नहीं आती है. लातेहार प्रखंड के तरवाडीह-नरेशगढ़ ग्राम के आठ ग्रामीणों ने जब सालों भर पानी बहनेवाली घघरी नदी की धारा को अपने खेतों तक ले जाने की दृढ़ निश्चय किया, तो अन्य ग्रामीण इसे इन लोगों की सनक बता कर मजाक उड़ाया. आखिर ग्रामीण इस बात से हैरान थे कि किस तरह घघरी नदी से तीन किलोमीटर दूर तक गांव में इस पानी को ले जाया सकता है, लेकिन जब इन ग्रामीणों ने अपनी इस कार्य योजना को अन्य ग्रामीणों के समक्ष रखा तो वे काफी प्रभावित हुए और उनके साथ हो लिये.
हरतुआ ग्राम निवासी रामसेवक सिंह ने घघरी नदी से सालों भर बहने वाली अविरल जलधारा से प्रेरित हो कर इसे खेतों तक पहुंचाने की एक योजना वर्ष 2012 में बनायी थी. उन्होंने ग्रामीणों के साथ मिल कर लातेहार के तत्कालीन डीसी, डीडीसी, बीडीओ से मुलाकात की और इस योजना को मूर्तरुप देने की अपील की. लेकिन जब एक वर्ष तक उनके गांव में न तो कोई अधिकारी और न ही जन प्रतिनिधि आये, तो उन्होंने ग्रामीणों के सहयोग से श्रमदान कर इस योजना को मूर्तरुप देने की योजना बनायी. उन्होंने पंचायत के ही दुर्गा सिंह, मंगल उरांव, भोला सिंह, सोहराई सिंह, राजमोहन उरांव, साहेब सिंह, रेखा सिंह, धर्म सहाय समेंत तकरीबन दर्जन भर गांवों के किसानों से इस योजना को लेकर विचार विमर्श किया. उनके द्वारा खींचे गये खाखा से सभी प्रभावित हुए और चंदा एकत्रित करना शुरू किया.
स्वंयसेवी संस्था आश्रय, लातेहार के वीरेंद्र प्रसाद ने पांच सौ रुपये दे कर चंदा का शुभारंभ किया. इसके बाद ग्रामीणों ने क्षमता से अधिक चंदा दिया. लगभग छह माह के अर्थ संग्रहण से करीब पांच लाख रुपये इनके पास जमा हो गये और 21 फरवरी 2013 को सैकड़ों हाथ इस योजना का जमीन पर उतारने के लिए आगे बढ़ गये. घघरी नदी पर नहर निर्माण का शिलान्यास होते ही कोने, नरेशगढ़, लुंडी, हरतुआ, बनबिरवा, ओरवाई, बिनगड़ा के सैकड़ों ग्रामीण महिला पुरुष अपने अपने हाथों में गैता-कुदाल एवं टोकरी लेकर नरेशगढ़ ग्राम स्थित योजना स्थल पर उमड़ पड़े. तीन किलोमीटर तक लंबे इस नहर का निर्माण ग्रामीणों द्वारा श्रमदान से कराना निश्चित रुप से प्रेरणादायक है. काम की गति को तेज करने के लिए ग्रामीणों ने अपनी इकट्ठी की गयी राशि से एक जेसीबी मशीन भाड़े पर लिया. इस काम की देखरेख की जवाबदेही गांव में इंजीनियर के नाम से प्रसिद्ध भागेश्वर उरांव को सौंपी गयी. भागेश्वर उरांव ने लातेहार प्रखंड के ही बारियातू ग्राम में एक सिंचाई योजना का निर्माण कराया गया था जो काफी सफल रहा. इसलिए उन्हें इस योजना में बतौर इंजीनियर नियुक्त किया गया.
श्री उरांव भी नि:शुल्क इस काम को अंजाम दे रहे हैं. ग्रामीण इंजीनियर जिसके पास डिग्री तो नहीं, लेकिन काम का अनुभव है. काम शुरू करने से पहले उन्होंने इस काम का दो माह तक सर्वे किया और इस नहर के मार्ग में पड़नेवाले सभी रैयतों से उनकी जमीन पर नहर निर्माण की सहमति प्राप्त किया. इस नहर के निर्माण हो जाने से तरवाडीह-नरेशगढ़ के सैकड़ों एकड़ खेतों में सिंचाई की सुविधा मिलेगी. जब तत्कालीन सांसद इंदर सिंह नामधारी को इस योजना की जानकारी मिली, तो काफी प्रभावित हुए और योजना स्थल तक गये और अपने निधि से पांच लाख रुपये इस योजना के लिए आंवटित किया.
इसके बाद तत्कालीन उपायुक्त अराधना पटनायक ने जिला योजना से इस योजना के लिए तीन लाख रुपये आवंटित किये. इतनी कम राशि से तीन किलोमीटर तक नहर का निर्माण मुश्किल था. लेकिन ग्रामीणों ने हार नहीं मानी और चंदा व श्रमदान जारी रखा. आज एक किलोमीटर तक नहर निर्माण कराया जा चुका है. उक्त गांव सरकार के द्वारा घोषित सरयू एक्शन प्लान में आता है. लेकिन इस योजना को सरयू एक्शन प्लान में शामिल नहीं किया गया है.
