कोच्चि से लौटकर बिपिन सिंह की रिपोर्ट
कोच्चि (केरल). कोच्चि यानी एर्नाकुलम को केरल की व्यावसायिक राजधानी कहा जाता है. लेकिन शहर का फोर्ट कोच्चि इलाका व्यापार के साथ-साथ अपने समृद्ध इतिहास और सांस्कृतिक विरासत के लिए भी खास पहचान रखता है. फोर्ट कोच्चि के ज्यू टाउन में स्थित संग्रहालय और आसपास की पुरानी बस्ती यह दिखाती है कि किसी क्षेत्र की विरासत को किस तरह सुरक्षित रखकर उसे आने वाली पीढ़ियों से जोड़ा जा सकता है.
ज्यू टाउन में मौजूद संग्रहालय ऐतिहासिक वस्तुओं का महज संग्रह नहीं है, बल्कि केरल के इतिहास, संस्कृति और परंपराओं की कहानी को जीवंत तरीके से सामने रखता है. सिनेगॉग के पास स्थित इस संग्रहालय में प्रवेश के लिए 50 रुपये का टिकट लिया जाता है.
यह पूरा इलाका झारखंड के लिए भी एक सीख है. राज्य में शैल चित्रों, गुफा कला, पुरातात्विक अवशेषों और आदिवासी संस्कृति से जुड़ी कई अनमोल धरोहरें मौजूद हैं. जरूरत इन्हें बेहतर तरीके से संरक्षित कर पर्यटन से जोड़ने की है.
संकरी गलियों में बसा है इतिहास
मट्टान्चेरी पैलेस और सिनेगॉग के बीच की संकरी सड़क पर बसा ज्यू टाउन एंटीक वस्तुओं के शौकीनों को खास तौर पर आकर्षित करता है. यहां लकड़ी, धातु और पारंपरिक शिल्प की दुकानें सजी हुई हैं.
इलाके के पुराने घरों में पुर्तगाली, डच और इजराइली संस्कृति का प्रभाव साफ दिखाई देता है. गलियों से गुजरते हुए यहां की वास्तुकला और जीवनशैली बीते दौर की याद दिलाती है.
इंडिया ट्रेड एंड स्पाइस एसोसिएशन की इमारत इस बात की गवाही देती है कि कभी कोच्चि का मसाला कारोबार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कितना महत्वपूर्ण था. ज्यू टाउन में डच, पुर्तगाली और ब्रिटिश वास्तुकला की झलक भी देखने को मिलती है.
सिनेगॉग की ओर बढ़ते हुए 'काशी' नाम का हेरिटेज भवन भी आकर्षित करता है. इसके मुख्य दरवाजे की चौखट और मेहराब पर 1761 ईस्वी अंकित है. यह पूरा इलाका बताता है कि विकास के साथ अपनी ऐतिहासिक पहचान को बचाकर रखना कितना जरूरी है.
सिनेगॉग में इतिहास और आधुनिक तकनीक का संगम
कोचीन प्रदेशी सिनेगॉग की स्थापना 1568 में हुई थी. इसे कॉमनवेल्थ देशों की सबसे पुरानी सिनेगॉग में गिना जाता है. अंदर पहुंचते ही रोमन और यहूदी वास्तुकला का प्रभाव दिखाई देता है.
सिनेगॉग की सजावट, छत से लटकती रंग-बिरंगी लाइटें और धार्मिक पुस्तकों का प्रदर्शन लोगों का ध्यान आकर्षित करता है.
संग्रहालय में इतिहास को केवल पुरानी वस्तुओं के जरिये नहीं दिखाया गया है, बल्कि पेंटिंग्स, आधुनिक डिस्प्ले और इंटरैक्टिव तकनीक का भी इस्तेमाल किया गया है. इससे खासकर युवा पीढ़ी के लिए इतिहास को समझना आसान और रोचक हो जाता है.
यहां 1805 में त्रावणकोर के महाराजा की ओर से तोराह के लिए भेंट किया गया सोने का मुकुट भी प्रदर्शित है. इसके अलावा मैकेनिकल घड़ी, बड़े संदूक और कई अन्य पुरानी वस्तुएं यहूदियों के सामाजिक और धार्मिक जीवन की कहानी बताती हैं.
पेंटिंग्स में दर्ज है यहूदियों के भारत आने का इतिहास
ज्यू म्यूजियम में लगी पेंटिंग्स भी अपने आप में इतिहास का दस्तावेज हैं. इनमें यहूदियों के भारत पहुंचने और कोच्चि में उनके बसने की कहानी को चित्रों के माध्यम से दिखाया गया है.
एक पेंटिंग में 70 ईस्वी में रोमनों द्वारा दूसरे मंदिर के विनाश और इसके बाद यहूदियों के अलग-अलग क्षेत्रों में फैलने की घटना को दर्शाया गया है.
अन्य पेंटिंग्स में 72 ईस्वी में शिंगली यानी क्रैंगानोर में यहूदियों के आगमन, 1568 में महाराजा के महल और मंदिर के पास कोचीन सिनेगॉग के निर्माण तथा 1949 में अंतिम महाराजा द्वारा अपनी यहूदी प्रजा को संबोधित करने जैसे ऐतिहासिक प्रसंगों को दिखाया गया है.
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केरल लोककथा संग्रहालय भी है खास
फोर्ट क्षेत्र में केरल लोककथा संग्रहालय भी अपनी अलग पहचान रखता है. यह केरल की करीब 1000 साल पुरानी संस्कृति, कला और वास्तुकला को सहेजने का महत्वपूर्ण केंद्र है.
संग्रहालय में 253 से अधिक भित्ति चित्रों से सजा भव्य लकड़ी का नृत्य थिएटर बनाया गया है. इसकी वास्तुकला और संग्रह पर्यटकों को केरल की लोक परंपराओं से परिचित कराते हैं. ब्रिटेन के राजा चार्ल्स तृतीय और महारानी कैमिला भी इस संग्रहालय का दौरा कर चुके हैं.
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झारखंड की विरासत को भी मिल सकता है नया जीवन
झारखंड का छोटानागपुर पठार और संताल परगना का राजमहल क्षेत्र प्राकृतिक संपदा के साथ-साथ प्राचीन मानव सभ्यता और आदिवासी संस्कृति की दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण है.
चौपारण और चतरा क्षेत्र में हजारों वर्ष पुराने सभ्यताओं के अवशेष मिलने की बात सामने आती रही है. हजारीबाग के बड़कागांव की पहाड़ियों में भित्तिचित्र और गुफा पेंटिंग्स हैं. वहीं गढ़वा के दुमदुमिया की गुफाओं में पुरापाषाण काल से जुड़े हिरण, भैंसे और शिकार करते आदिम मानवों के रेखाचित्र मौजूद हैं.
इन धरोहरों को यदि केरल की तर्ज पर वैज्ञानिक तरीके से संरक्षित किया जाये, उनके आसपास जरूरी पर्यटन सुविधाएं विकसित की जायें और डिजिटल माध्यमों से उनकी कहानी पर्यटकों तक पहुंचायी जाये, तो झारखंड की प्राचीन विरासत को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर नई पहचान मिल सकती है.
केरल के फोर्ट कोच्चि और ज्यू टाउन की सबसे बड़ी सीख यही है कि विरासत को सिर्फ पुराने ढांचे के रूप में नहीं, बल्कि इतिहास, संस्कृति, शिक्षा और पर्यटन के जीवंत माध्यम के रूप में विकसित किया जा सकता है.
