गांवों में आज भी जीवित है हजारों साल पुरानी मदइद परंपरा

ग्रामीण क्षेत्र में मदइद की परंपरा आज भी जीवित है. इसके तहत ग्रामीण एक-दूसरे की मदद कर कामों का निष्पादन करते हैं.

रनिया, भूषण कांसी. जिले के ग्रामीण क्षेत्र में मदइद की परंपरा आज भी जीवित है. इसके तहत ग्रामीण एक-दूसरे की मदद कर कामों का निष्पादन करते हैं. इन दिनों धान की खेती में इसी परंपरा से धान रोपनी की जाती है. जिसमें सभी ग्रामीण मिल कर एक-दूसरे के खेतों में धान रोपते हैं. रनिया के गोयलकेरा, मनहतू, डोंयगर, बलंकेल, गोरसोद आदि गांव में ग्रामीणों ने मदइद परंपरा से धान रोपनी कर रहे हैं. धान रोपनी के पूर्व खेत तैयार करने, हल चलाने, निकाई करने, बीड़ा लगाने सहित अन्य कार्य में भी परंपरा का निर्वहन किया जाता है. यह परंपरा गांव के लोगों में आपसी भाईचारा, एकजुटता और एक दूसरे के सुख-दुख के संबंधों को दर्शाता है. वहीं पैसों की भी बचत होती है. इस परंपरा से वैसे किसानों को भी सहायता मिल जाती है, जिसके परिवार में कम सदस्य रहते हैं और आर्थिक रूप से कमजोर रहते हैं. गोयलकेरा और मनहातू के किसान अगस्टीन भेंगरा, अजय पहान, बिरसा पाहन और मंगरा पहान ने बताया कि अत्यधिक बारिश से इस वर्ष धान रोपने में किसानों को भारी परेशानी हुई है. किसान बताते हैं कि क्षेत्र के अधिकतर किसान जुलाई माह के दूसरे या चौथे सप्ताह तक धान रोकने का कार्य कर लेते थे. मुखिया रीमिश कंडुलना ने बताया कि गांवों में पारंपरिक रीति-रिवाज आज भी जारी है. गांवों में लोग अपना काम एक दूसरे का सहयोग मेल मिलाप से ही निपटारा करते है. हेम्बो मुंडा ने बताया कि मदइद परंपरा को मुंडारी में पाचा भी कहते हैं. खेती-बारी सहित अन्य कामों में भी इसी परंपरा से एक-दूसरे की सहायता की जाती है. ग्राम प्रधान उमल मुंडा ने कहा कि हमारा क्षेत्र कृषि प्रधान क्षेत्र है. मदइद परंपरा से सभी की मदद हो जाती है. कुशल कुंडलना ने बताया कि गांव में कृषि तकनीक कुछ अलग है. जिस दिन किसी किसान के खेत में धान रोपनी होती है, गांव के सभी लोग अपना काम छोड़ उसके काम के लिए घर से निकल पड़ते हैं.

कृषि कार्य सहित अन्य कामों में ग्रामीण एक-दूसरे की करते हैं मददB

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By CHANDAN KUMAR

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