खूंटी : जिले के बच्चे, जवान, बूढ़े सभी इंटरनेट की गिरफ्त में हैं. ट्वीट, टेवस्ट, वाट्सएप, ई-मेल आदि का प्रचलन बढ़ गया है. एक शोध को सही मानें तो इंटरनेट ने युवाओं व बच्चों को एकाकीपन और अवसाद का शिकार बना दिया है. अधिकतर लोग ऑब्सेसिव कंपलसिव डिसऑर्डर और इम्पल्स कंट्रोल डिसआर्डर जैसी मानसिक बीमारी की गिरफ्त में आ रहे हैं.
दिमाग पर असर : सिविल सर्जन डॉ विजय खन्ना के मुताबिक इंटरनेट क्रेजी लोगों का दिमाग किसी शराबी की दिमाग के जैसे हो जाता है. दिमाग में जहां सावधानी और नियंत्रण तंत्र होते हैं, वहां एब्नॉर्मल व्हाइट मेटर का निर्माण हो रहा है. ऐसा परिवर्तन वैसे बच्चों या युवाआें में पाया जा रहा है जो वीडियो गेम या इंटरनेट के आदि हैं.
क्या कहते हैं
विशेषज्ञ : डॉ सुनील खलखो कहते है कि आदत में कोई भी व्यवहार ऐसा शामिल हो, जिसके बिना आपको मन नहीं लगता है, वह रुचि हो सकती है. पर आप इस आदत कि आप घंटों एकांत में एक अलग रहें, तो यह खतरे व नशा का संकेत है. अभिभावक बच्चों पर नजर रखें. अगर एकांत में बच्चा रहना पसंद करता है तो यह भी अवसाद का एक बड़ा कारण हो सकता है. बच्चों को हमेशा परिवार के सदस्यों के बीच रखना चाहिए.
