पिठौरिया से सुजीत कुमार केशरी की रिपोर्ट
Khortha Language: झारखंड की प्रमुख क्षेत्रीय भाषा खोरठा को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने की मांग एक बार फिर जोर पकड़ती नजर आ रही है. इस दिशा में खोरठा साहित्य संस्कृति परिषद् के रांची प्रभारी सह राधा गोविन्द विश्वविद्यालय रामगढ़ के खोरठा विभागाध्यक्ष अनाम ओहदार अजनबी ने पहल करते हुए राज्यसभा सांसद खीरू महतो से उनके पैतृक गांव केदला बस्ती, रामगढ़ स्थित आवास पर शिष्टाचार मुलाकात की. इस दौरान उन्होंने खोरठा भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग से संबंधित एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा.
सांसद से मुलाकात और ज्ञापन सौंपा
मुलाकात के दौरान अनाम ओहदार ने खोरठा भाषा की वर्तमान स्थिति, उसके सामाजिक महत्व और भाषाई विस्तार से जुड़े ठोस तथ्यों को सांसद के समक्ष रखा. उन्होंने आग्रह किया कि राज्यसभा में इस विषय को गंभीरता से उठाया जाए, ताकि केंद्र सरकार का ध्यान झारखंड की इस व्यापक रूप से बोली जाने वाली भाषा की ओर आकर्षित हो सके.
झारखंड की सांस्कृतिक पहचान है खोरठा
उन्होंने कहा कि खोरठा केवल एक बोली नहीं, बल्कि झारखंड की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण आधार है. यह भाषा राज्य के लगभग 16 जिलों में व्यापक रूप से प्रचलित है और सदान तथा आदिवासी समुदायों के बीच संपर्क भाषा की भूमिका निभाती है. सामाजिक समरसता और पारस्परिक संवाद में खोरठा का योगदान उल्लेखनीय रहा है.
जनसंख्या के आंकड़ों का हवाला
ज्ञापन में जनगणना के आंकड़ों का विशेष रूप से उल्लेख किया गया. अनाम ओहदार ने बताया कि वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार खोरठा भाषियों की संख्या लगभग 49 लाख दर्ज की गई थी. वर्ष 2011 में यह संख्या बढ़कर लगभग 85 लाख के आसपास पहुंच गई.
दो करोड़ खोरठा भाषा-भाषियों की संख्या
उन्होंने तर्क दिया कि यदि वर्तमान समय में भाषा आधारित नई जनगणना कराई जाए तो खोरठा भाषियों की संख्या लगभग दो करोड़ के आसपास हो सकती है. पिछले एक दशक में जनसंख्या वृद्धि और भाषाई विस्तार को देखते हुए यह अनुमान निराधार नहीं है. बड़ी संख्या में लोग अपनी मातृभाषा के रूप में खोरठा को स्वीकार कर रहे हैं, जिससे इसकी व्यापकता और भी स्पष्ट होती है.
साहित्यिक समृद्धि और सांस्कृतिक आधार
अनाम ओहदार ने इस बात पर भी जोर दिया कि खोरठा भाषा का साहित्यिक संसार अत्यंत समृद्ध है. खोरठा में गद्य और पद्य साहित्य की लंबी परंपरा मौजूद है. लोकगीत, लोककथाएं, कहानियां, नाटक और आधुनिक साहित्यिक कृतियां इस भाषा की सांस्कृतिक गरिमा को प्रमाणित करती हैं. उन्होंने कहा कि किसी भी भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए उसकी ऐतिहासिक परंपरा, साहित्यिक संपन्नता और सामाजिक उपयोगिता महत्वपूर्ण मापदंड होते हैं. खोरठा इन सभी मानकों पर खरी उतरती है. इसके बावजूद इसे अभी तक संवैधानिक मान्यता नहीं मिल पाई है, जो लाखों भाषाभाषियों के लिए चिंता का विषय है.
शैक्षणिक और प्रतियोगी परीक्षाओं में उपयोग
ज्ञापन में यह भी उल्लेख किया गया कि झारखंड की विभिन्न प्रतियोगिता परीक्षाओं जैसे जेपीएससी, जेएसएससी, सीजीएल और अन्य राज्य स्तरीय परीक्षाओं में बड़ी संख्या में विद्यार्थी खोरठा भाषा को विषय के रूप में चुनते हैं. इन परीक्षाओं में खोरठा विषय से अभ्यर्थियों को उल्लेखनीय सफलता भी मिल रही है. इससे स्पष्ट है कि भाषा न केवल सामाजिक जीवन में बल्कि शैक्षणिक और प्रशासनिक स्तर पर भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है. विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में खोरठा विभागों की स्थापना और शोध कार्य भी इसकी अकादमिक उपयोगिता को रेखांकित करते हैं.
राज्यसभा में पहल की मांग
अनाम ओहदार ने सांसद खीरू महतो से आग्रह किया कि वे राज्यसभा में प्रश्न, ध्यानाकर्षण प्रस्ताव या निजी विधेयक के माध्यम से इस मुद्दे को उठाएं. उनका कहना था कि यदि संसद में इस विषय पर गंभीर बहस होती है तो खोरठा को आठवीं अनुसूची में शामिल कराने की दिशा में ठोस पहल संभव हो सकेगी.उन्होंने यह भी कहा कि यह केवल एक भाषा की मान्यता का सवाल नहीं है, बल्कि झारखंड के लाखों लोगों की सांस्कृतिक अस्मिता और सम्मान से जुड़ा विषय है. वर्षों से खोरठा भाषी समाज इस मांग को लेकर संघर्षरत है और अब समय आ गया है कि इसे संवैधानिक पहचान दी जाए.
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समाज में सकारात्मक प्रतिक्रिया
इस मुलाकात और पहल को खोरठा भाषी समाज के बीच एक सकारात्मक कदम के रूप में देखा जा रहा है. लोगों को उम्मीद है कि राजनीतिक स्तर पर सक्रिय पहल होने से इस मांग को नई दिशा मिलेगी. खोरठा को आठवीं अनुसूची में शामिल किए जाने से न केवल भाषा का संरक्षण और संवर्धन होगा, बल्कि झारखंड की सांस्कृतिक विविधता को भी राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलेगी. अब देखना यह है कि संसद में इस मुद्दे को किस प्रकार आगे बढ़ाया जाता है और केंद्र सरकार इस पर क्या रुख अपनाती है.
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