नई दिल्ली से अंजनी सिंह की रिपोर्ट
Jharkhand Coal Mines Fossils: झारखंड की ओपन कास्ट कोयला खदानों (ओसीपी) ने एक ऐसे प्राचीन संसार का रहस्य उजागर किया है, जो न तो इंसानों के समय का है और न ही डायनासोर के. लगभग 28-30 करोड़ वर्ष पहले अस्तित्व में रहे घने दलदली जंगलों और नदियों के जाल का प्रमाण झारखंड के नॉर्थ कर्णपुरा स्थित अशोका कोयला परियोजना की माइंस से मिले हैं. यह बहु-विषयक शोध बीरबल साहनी जीवाश्म विज्ञान संस्थान (बीएसआइपी) के वैज्ञानिकों के नेतृत्व में किया गया. यह संस्थान भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के अधीन स्वायत्त इकाई है. अंतरराष्ट्रीय जर्नल (इंटरनेशनल जर्नल ऑफ कोल जियोलोजी) में अध्ययन का निष्कर्ष प्रकाशित हुआ है.
गोंडवाना काल का पुनर्निर्माण
अध्ययन के अनुसार, उस दौर में भारत, अंटार्कटिक, दक्षिण अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया मिल कर गोंडवानालैंड नामक दक्षिणी महाद्वीप का हिस्सा थे. झारखंड का यह इलाका तब घने दलदली वनों और नदियों से आच्छादित था, जिसे कभी-कभार समुद्र के भी छूने की संभावना जतायी गयी है. अशोक कोल माइंस (नॉर्थ कर्णपुरा बेसिन, झारखंड) से मिले जीवाश्मों में विलुप्त बीज-पौधों के समूह ग्लोसोप्टेरिस की भरमार पायी गयी. शेल परतों में 14 से अधिक प्रजातियों के पत्तों, जड़ों, बीजों और पराग कणों के नाजुक जीवाश्म सुरक्षित मिले हैं. सबसे महत्वपूर्ण खोज दामोदर बेसिन में पहली बार मिला ग्लोसोप्टेरिस के किशोरावस्था का नर शंकु (जुवेनााइल मेल कोन) है. इसे वनस्पति विज्ञान की ‘मिसिंग कड़ी’ माना जा रहा है, जिससे वैज्ञानिक यह समझ सकेंगे कि ये प्राचीन वृक्ष किस तरह प्रजनन करते थे.
समुद्री अतिक्रमण के पुख्ता संकेत
कोयले और शेल नमूनों की सूक्ष्म जांच में ‘फ्राम्बॉइडल पाइराइट’ रसभरी जैसे आकार वाले खनिज कण और उच्च सल्फर के स्तर मिले. यह संकेत देता है कि उस समय दलदली क्षेत्र में खारे पानी की स्थिति थी. ऐसा सामान्य कोयला जमाव में दुर्लभ होता है. गैस क्रोमैटोग्राफी-मास स्पेक्ट्रोमेट्री (जीसी-एमएस) विश्लेषण से पता चला कि लगभग 28–29 करोड़ वर्ष पहले पर्मियन काल में समुद्र ने पूर्वोत्तर भारत से होते हुए मध्य भारत की ओर बढ़ते हुए दामोदर बेसिन तक प्रवेश किया.
आज के जलवायु संकट से जुड़ा सबक
यह शोध न केवल झारखंड के भूगर्भीय इतिहास को समृद्ध करता है, बल्कि वर्तमान जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण है. वैज्ञानिकों का मानना है कि जिस तरह पर्मियन काल में समुद्र स्तर बढ़ने से महाद्वीपीय भूभाग प्रभावित हुए, उसी तरह आज ध्रुवीय बर्फ के पिघलने से बढ़ता समुद्र स्तर भविष्य में तटीय और आंतरिक भू-भागों को प्रभावित कर सकता है. झारखंड की कोयला खदानों से निकले ये साक्ष्य बताते हैं कि धरती का इतिहास बार-बार बदलते पर्यावरण और समुद्री अतिक्रमण का गवाह रहा है और अतीत की यह कहानी भविष्य के लिए चेतावनी भी है.
अध्ययन का मकसद
नॉर्थ कर्णपुरा बेसिन स्थित अशोका कोल माइंस का अध्ययन प्राचीन वनस्पति (पैलियो वेजिटेशन), प्राचीन पारिस्थितिकी (पैलियो इकोलॉजी) और निक्षेपण परिस्थितियों को समझने के मकसद से किया गया. यह बेसिन लोअर गोंडवाना अनुक्रमों के उत्कृष्ट रूप से संरक्षित और विविध पौध जीवाश्मों का भंडार है. अपने उत्कर्ष काल में इसका पृथ्वी की सतह के लगभग 16 फीसदी क्षेत्र पर कब्जा था. यही कारण है कि यह वैश्विक पेलियोग्राफिक और भूवैज्ञानिक अध्ययनों का महत्वपूर्ण केंद्र बना. पर्मियन काल में इन भू-भागों पर ग्लोसोप्टेरिस वनस्पति अत्यंत प्रचुर मात्रा में पायी जाती थी. पर्मियन काल में दो महाविलुप्ति घटनाएं हुईं, जिससे जलवायु में बड़े उतार-चढ़ाव देखने को मिले. प्रारंभिक पर्मियन के अंत तक जलवायु परिवर्तन ने नदीय वातावरण को बढ़ावा दिया, जिससे दक्षिणी अक्षांशों में ग्लॉसोप्टरिड्स का तेजी से विकास हुआ.
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गोंडवाना विघटन के बाद बने बड़े कोयला भंडार
पर्मियन काल में भारतीय उपमहाद्वीप 20° से 45° दक्षिण अक्षांश के बीच स्थित था. गोंडवाना के विघटन के बाद भारत में बड़े कोयला भंडार बने. पर्मियन काल के अंत में महाद्वीपीय विघटन, ज्वालामुखीय गतिविधियों और टेक्टोनिक परिवर्तनों के कारण वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की वृद्धि हुई, जिसके कारण हिमनद पिघलने लगे और समुद्री स्तर में वृद्धि हुई.
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