गालूडीह : बिहड़ और पहाड़ी इलाकों में रहने वाले ग्रामीणों के लिए जंगल आज भी रोजगार और रोजी-रोटी का बड़ा सहारा बना हुआ है. इन दिनों मिर्गीटाड़, डुमकाकोचा, नरसिंहपुर, गुड़ुरबासा समेत आसपास के गांवों के ग्रामीण सुबह होते ही जंगल की ओर निकल पड़ते हैं. जंगल से दातुन और साल (सखुआ) के पत्ते तोड़कर ग्रामीण गालूडीह बाजार पहुंच रहे हैं और इन्हें बेचकर परिवार का भरण-पोषण कर रहे हैं. दरअसल धान रोपनी समाप्त होने के बाद रोजगार बंद हो जाता है. भादो महीने में रोजगार का संकट रहता है. इसके कारण इस माह अधिकांश लोग जंगल से रोजगार करते हैं.
जंगल से जुटाते हैं दातुन-पत्ता, बाजार में होती है बिक्री
मिर्गीटाड़ जंगल और आस पास के वन क्षेत्रों से ग्रामीण दातुन और साल पत्ते एकत्र करते हैं. इसके बाद उन्हें बंडल बनाकर गालूडीह बाजार में बेचने के लिए लाया जाता है. बाजार में दातुन का एक बंडल करीब 10 रुपये, जबकि साल पत्ते का बंडल भी करीब 10 रुपये में बिक रहा है. कम कीमत के बावजूद ग्रामीणों के लिए यह आमदनी का महत्वपूर्ण जरिया है. ग्रामीण का कहना है कि गांव में रोजगार के साधन सीमित हैं. खेती का काम हर समय नहीं मिलता. ऐसे में जंगल से दातुन और साल पत्ता लाकर बाजार में बेचने से रोज कुछ नकद पैसा मिल जाता है. इसी कमाई से घर का राशन और बच्चों की जरूरतें पूरी करने में मदद मिलती है.
छोटी कमाई, परिवार के खर्च में बड़ा सहारा : ग्रामीण
गुरुवारी सोरेन ने बताया कि ताजे साल के पत्तों की स्थानीय स्तर पर काफी मांग रहती है. ग्रामीण इन्हें सावधानी से तोड़कर बंडल तैयार करते हैं. वहीं दातुन भी ग्रामीण बाजार में आसानी से बेच लेते हैं. कई लोग आज भी टूथपेस्ट और ब्रश के जगह दातुन उपयोग करना पसंद करते हैं. उन्होंने बताया कि दिन भर की मेहनत के बाद होने वाली यह छोटी कमाई परिवार की जरूरतें पूरी करने में मदद करती है. जंगल उनके लिए सिर्फ वन संपदा का स्रोत नहीं, बल्कि घर का चूल्हा जलाने का जरिया भी बना हुआ है.
