प्रमुख संवाददाता, जमशेदपुर
पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन ने राज्य सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि झारखंड शायद पहला ऐसा राज्य है, जहां पेसा नियमावली के नाम पर आदिवासियों को ठगा गया है. उन्होंने कहा कि ग्राम सभाओं के गठन की प्रक्रिया में पारंपरिक ग्राम प्रधानों के अलावा वैकल्पिक रास्ता भी खोल दिया गया है.
बालू और मछली के अधिकारों का किया जिक्र
चंपाई सोरेन ने कहा कि जब अपने घाटों के बालू और तालाबों की मछलियों पर ही ग्राम सभाओं को अधिकार नहीं मिल पाया है, तो बाकी अधिकारों की बात करना बेईमानी है. वह रविवार को कांड्रा स्थित फॉरेस्ट गेस्ट हाउस में आदिवासी सांवता सुसार अखाड़ा की ओर से विश्व आदिवासी दिवस की तैयारियों को लेकर आयोजित समीक्षा बैठक को संबोधित कर रहे थे.
उन्होंने कहा कि पेसा में ग्राम सभा की ‘अनुमति’ की जगह ‘सहमति’ और ‘30 दिनों में स्वतः स्वीकृति’ जैसे शब्दों का भ्रम पैदा किया गया है, ताकि ग्राम सभा के अधिकारों को सीमित किया जा सके. अगर ग्राम सभा ने किसी प्रस्ताव को 30 दिनों के अंदर मंजूरी नहीं दी, तो उसे अपने आप स्वीकृत मान लिया जाएगा. ऐसी स्थिति में ग्राम सभा के अस्तित्व का कोई मतलब नहीं रह जाता.
धर्मांतरण और घुसपैठ समेत कई मुद्दों पर चिंता जताई
चंपाई सोरेन ने कहा कि झारखंड का आदिवासी समाज आज धर्मांतरण, घुसपैठ के साथ-साथ अस्तित्व के संकट से जूझ रहा है. आगामी नौ अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस के मौके पर समाज इन गंभीर विषयों पर आत्मचिंतन करेगा.
बैठक में संगठन के संयोजक रामदास टुडू, माझी बाबा दारा सिंह सोरेन, सोनाराम मार्डी, राम हांसदा, सुजान हांसदा, पवन हांसदा, मोहन बास्के, पाइतो सोरेन, मनसा राम मुर्मू सहित बड़ी संख्या में समाज के लोग मौजूद थे.
