हड़िया सिर्फ नशे का पेय नहीं, डॉ. सुकन्या हेंब्रम की 7 साल की रिसर्च में सामने आये कई औषधीय गुण

हड़िया सिर्फ एक पारंपरिक पेय नहीं, बल्कि स्वास्थ्यवर्धक तत्वों से भरपूर है. जमशेदपुर की एक शोधकर्ता ने 7 साल के अध्ययन के बाद हड़िया के वैज्ञानिक रहस्यों का खुलासा किया है. जानें कैसे यह प्राकृतिक पेय सेहत के लिए फायदेमंद है.

जमशेदपुर: झारखंड की जनजातीय संस्कृति और जीवन शैली में हड़िया का एक विशेष महत्व रहा है. इसे सदियों से एक पारंपरिक पेय और औषधि के रूप में देखा जाता है. हाल ही में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय की शोधकर्ता डॉ. सुकन्या हेंब्रम ने अपने सात साल लंबे शोध के बाद हड़िया के वैज्ञानिक पहलुओं को उजागर किया है.

वर्ष 2019 से शुरू हुआ यह शोध अगस्त 2026 में पूरा हुआ, जिसमें रांची, खूंटी, गुमला और रामगढ़ जिलों का अध्ययन शामिल है. इस शोध से स्पष्ट हुआ है कि पारंपरिक रूप से बनायी जाने वाली हड़िया में कई स्वास्थ्यवर्धक तत्व मौजूद होते हैं.

7 साल के अध्ययन से सामने आयी हड़िया की सच्चाई

शोधकर्ता डॉ. सुकन्या हेंब्रम ने बताया कि उन्होंने अपनी पीएचडी थीसिस के तहत इस विषय पर गहराई से काम किया. इस दौरान संत जेवियर कॉलेज और विश्वविद्यालय के विशेषज्ञ शिक्षकों का मार्गदर्शन मिला. अध्ययन के लिए अलग-अलग क्षेत्रों से चावल एकत्र किये गये और कुल 12 किलोग्राम चावल का प्रयोग करके माइक्रोबायोलॉजी लैब में हड़िया तैयार की गयी.

जांच के दौरान यह पाया गया कि खूंटी और गुमला जैसे अलग-अलग इलाकों में चावल की किस्मों (जैसे अरवा, उसना, करहनी और मडुवा) के अनुसार इसके स्वाद और गुणों में भिन्नता आती है.

प्राकृतिक जड़ी-बूटियों से तैयार किया जाता है 'रानु'

हड़िया बनाने की प्रक्रिया में चावल को पकाने के बाद छांव या अंधेरे कमरे में जाटी या फिर किसी प्लास्टिक में सुखाया जाता है. इसके बाद जंगलों से लायी गयी प्राकृतिक जड़ी-बूटियों से तैयार 'रानु' (एक प्रकार की प्राकृतिक दवा या खमीर) को हाथों से मिलाहड़ियाया जाता है. इसे दो से चार दिनों तक ढककर रखा जाता है, जिससे इसमें प्राकृतिक किण्वन (फरमेंटेशन) होता है. शोध में पाया गया कि गुमला में लाल चावल (करहनी) और खूंटी में अरवा चावल से बनने वाली हड़िया विशेष स्वाद और गुणों से भरपूर होती है.

लैब परीक्षण में मिले औषधीय तत्व और लैक्टोबैसिलस

लैब में जब हड़िया और उसके पानी की वैज्ञानिक जांच की गई, तो इसमें सेहत के लिए फायदेमंद लैक्टोबैसिलस बैक्टीरिया और एंटी-ऑक्सीडेंट पाये गये. यह तत्व पेट के स्वास्थ्य को दुरुस्त रखने और पाचन तंत्र को मजबूत बनाने में मदद करते हैं. पारंपरिक मान्यता है कि सही तरीके से बनायी गयी हड़िया के सेवन से पीलिया जैसी बीमारियों में भी राहत मिलती है. हालांकि, शोध में यह चेतावनी भी दी गई है कि बाजार में मिलने वाली मिलावटी हड़िया में रसायनों का इस्तेमाल होता है, जो सेहत के लिए हानिकारक हो सकता है.

शराब और पारंपरिक हड़िया के बीच का अंतर

शोध में हड़िया और साधारण शराब के अंतर को साफ तौर पर समझाया गया है. शराब को डिस्टिलेशन और औद्योगिक प्रक्रियाओं द्वारा तैयार किया जाता है, जबकि हड़िया पूरी तरह से प्राकृतिक अनाज और जड़ी-बूटियों से बनती है. आदिवासी समाज में हड़िया केवल पीने की चीज नहीं है, बल्कि यह पूजा-पाठ, धार्मिक अनुष्ठानों और सामाजिक आयोजनों में प्रसाद के रूप में अर्पित की जाती है. इसका जुड़ाव आस्था और सांस्कृतिक पहचान से है.

भावी पीढ़ियों के लिए 200 पन्नों की शोध रिपोर्ट

डॉ. सुकन्या ने करीब 200 पन्नों की अपनी थीसिस में हड़िया से जुड़े सूक्ष्मजीवों और इसके पारंपरिक ज्ञान को दर्ज किया है. उनका मानना है कि आने वाले समय में नये विद्यार्थियों और वैज्ञानिकों के लिए यह अध्ययन एक आधार बनेगा. हड़िया में इस्तेमाल होने वाली जड़ी-बूटियों पर और अधिक रिसर्च की आवश्यकता है ताकि सदियों पुराने इस पारंपरिक और सांस्कृतिक ज्ञान को वैज्ञानिक पहचान के साथ सुरक्षित रखा जा सके.

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लेखक के बारे में

By दशमत सोरेन

दशमत सोरेन ने रांची विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर किया है. वे 29 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. उनकी विशेषज्ञता मुख्य रूप से झारखंड की आदिवासी-मूलवासी राजनीति, स्थानीय समुदायों की भाषा-संस्कृति और यहां के सामाजिक ताना-बाना है. वे वर्ष 2010 से प्रभात खबर के साथ एक ट्राइबल रिपोर्टर के रूप में काम कर रहे हैं.

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