इस गांव में सड़क नहीं, गर्भवती व मरीजों को कंधे पर अस्पताल ले जाना मजबूरी

मुसाबनी के बालीडुंगरी गांव में सड़क की बदहाली से ग्रामीण परेशान हैं. कीचड़ के कारण एंबुलेंस नहीं पहुंच पाती और बीमारों को खटिया पर ढोना पड़ता है.

मुसाबनी : सरकार भले ही गांव-गांव तक सड़क, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाएं पहुंचाने के दावे करती हो, लेकिन आकांक्षी प्रखंड मुसाबनी की गोहला पंचायत के विक्रमपुर बालीडुंगरी टोला की तस्वीर इन दावों से बिल्कुल अलग है. बारिश शुरू होते ही टोला की मुख्य सड़क कीचड़ और दलदल में तब्दील हो जाती है. सड़क पर जगह-जगह बने गड्ढे ग्रामीणों की मुश्किलें और बढ़ा देते हैं. हालात ऐसे हैं कि बीमार व्यक्ति ही नहीं, गर्भवती महिलाओं को भी खटिया पर लिटाकर कंधे के सहारे टोला से बाहर मुख्य सड़क तक ले जाना पड़ता है.

जब प्रसव पीड़ा उठे तो खटिया ही बनती है सहारा

बालीडुंगरी टोला में सड़क की बदहाली सिर्फ आवागमन की समस्या नहीं है, बल्कि यह ग्रामीणों के लिए जान का जोखिम बन चुकी है. बारिश के दिनों में कीचड़ के कारण एंबुलेंस टोला तक नहीं पहुंच पाती. ऐसे में अगर किसी महिला को प्रसव पीड़ा शुरू हो जाए तो परिवार के सामने सबसे बड़ी चुनौती उसे अस्पताल तक पहुंचाने की होती है. ग्रामीण गर्भवती महिला को खटिया पर लिटाकर कंधे पर उठाते हैं. कीचड़ भरी सड़क पार कर टोला के बाहर मुख्य सड़क तक ले जाते हैं. वहां से किसी वाहन की मदद लेकर उसे अस्पताल पहुंचाया जाता है. बीमारी या प्रसव के समय ग्रामीणों की यह मजबूरी व्यवस्था की जमीनी हकीकत बयां करती है.

सड़क पर ईंट-पत्थर बिछाकर रास्ता बनाने की कोशिश

बारिश के बाद सड़क इतनी खराब हो जाती है कि उस पर बाइक या साइकिल चलाना भी मुश्किल हो जाता है. ग्रामीणों ने आवागमन के लिए सड़क किनारे ईंट और पत्थर बिछा रखे हैं. इसी के सहारे किसी तरह पैदल आने-जाने की कोशिश होती है. ग्रामीणों का कहना है कि सड़क की मरम्मत नहीं होने के कारण हर साल बरसात में यही स्थिति पैदा होती है. सड़क जर्जर होने कारण बच्चों, बुजुर्गों, मरीजों और गर्भवती महिलाओं को सबसे ज्यादा परेशानी झेलनी पड़ती है.

पेंशन-राशन से भी वंचित हैं पार्वती सबर

टोला की आदिम जनजाति की विधवा पार्वती सबर भी सरकारी सुविधाओं की कमी का दर्द झेल रही हैं. उन्हें अब तक पेंशन और राशन की सुविधा नहीं मिल पाई है. वर्षों पहले बना उनका आवास भी अब जर्जर हो चुका है. वह घर में अकेली रहती हैं. जीवन-यापन के लिए पार्वती जंगल से सूखी लकड़ी, दातुन और पत्ते लाती हैं और उन्हें बेचकर किसी तरह अपना गुजारा करती हैं. सरकारी योजनाओं के दावों के बीच उनका जीवन आज भी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहा है.

प्रमाण पत्र नहीं होने से दिव्यांग चेतन को नहीं मिल रहा हक

टोला के दिव्यांग चेतन मुर्मू भी सरकारी सुविधाओं से दूर हैं. उनके पास दिव्यांग प्रमाण पत्र और जाति प्रमाण पत्र नहीं होने के कारण उन्हें पेंशन और व्हीलचेयर जैसी सुविधाओं का लाभ नहीं मिल सका है. बालीडुंगरी टोला के ग्रामीणों की समस्याएं सिर्फ सड़क तक सीमित नहीं हैं. स्वास्थ्य सुविधा, सड़क, पेंशन और राशन जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए भी ग्रामीणों को संघर्ष करना पड़ रहा है. बारिश में सड़क दलदल बन जाती है, मरीजों को खटिया पर ढोना पड़ता है. गर्भवती महिलाओं को अस्पताल पहुंचाने के लिए भी ग्रामीणों को खुद रास्ता बनना पड़ता है. दूसरी ओर, जरूरतमंदों को पेंशन और राशन जैसी योजनाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है.


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लेखक के बारे में

By मो. युनूस परवेज

मो. युनूस परवेज वर्ष 1995 से पत्रकारिता कर रहे हैं. उन्होंने घाटशिला महाविद्यालय और रांची विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में स्नातक और राजनीतिक विज्ञान ऑनर्स की डिग्री हासिल की है. इनकी राजनीति, अपराध, नक्सलवाद, खेल, शिक्षा और खेती किसानी की खबरों में विशेष रुचि है. डिजिटल जर्नलिज्म में 5 साल का अनुभव है.

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