ग्रामीणों ने आषाढ़ी पूजा कर अच्छी बारिश व फसल के लिए देवी-देवताओं से की प्रार्थना

तालसा गांव में आषाढ़ी पूजा की गयी. गांव के माझी बाबा दुर्गाचरण मुर्मू के नेतृत्व में नायके बाबा (पुजारी) हाबीराम मुर्मू द्वारा पूजा की गयी. नायके बाबा ने आषाढ़ी पूजा में ग्राम के देवी- देवताओं का आह्वान किया. ग्रामीणों ने देवी-देवताओं के चरणों में नतमस्तक होकर अच्छी बारिश व फसल की कामना की.

जमशेदपुर. सुंदरनगर क्षेत्र के तालसा गांव में आषाढ़ी पूजा की गयी. गांव के माझी बाबा दुर्गाचरण मुर्मू के नेतृत्व में नायके बाबा (पुजारी) हाबीराम मुर्मू द्वारा पूजा की गयी. नायके बाबा ने आषाढ़ी पूजा में ग्राम के देवी- देवताओं का आह्वान किया. ग्रामीणों ने देवी-देवताओं के चरणों में नतमस्तक होकर अच्छी बारिश व फसल की कामना की. साथ ही गांव में हमेशा सुख-शांति बनी रहे और किसी तरह का रोग व बीमारी नहीं फैले, इसके लिए भी सामूहिक प्रार्थना की. पूजा-अर्चना के बाद लोगों के बीच प्रसाद वितरण किया गया. पूजा-अर्चना में बड़ा संग्राम मुर्मू, पारानिक सुकमन मुर्मू, जोगमाझी दिनेश मुर्मू, घानी मुर्मू, बिरेश हेंब्रम, बरियाड़ टुडू, गुपाद मुर्मू, दिलीप मुर्मू, गाजी मुर्मू, लखन हेंब्रम, सुना मुर्मू, मेघराय मुर्मू, चंद्र हेंब्रम, गुरबा हेंब्रम, सनातन हेंब्रम समेत अन्य ने योगदान दिया.
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बारिश नहीं होने से किसान परिवार चिंतित
बारिश का भारतीय कृषि में विशेष महत्व है, विशेषकर खरीफ फसलों के लिए जो पूरी तरह से मानसून पर निर्भर होती हैं. जब बारिश में कमी आती है, तो इसका प्रभाव केवल फसलों पर ही नहीं पड़ता, बल्कि इससे किसान परिवारों की पूरी आजीविका पर संकट मंडराने लगता है. बारिश न होने से किसानों की चिंता वाजिब है. यह एक गंभीर समस्या है, जिसका समाधान केवल सरकारी प्रयासों से ही नहीं, बल्कि सामूहिक और सामाजिक प्रयासों से भी संभव है. हमें यह समझना होगा कि किसान हमारे देश की रीढ़ हैं और उनका हित हमारे समाज और अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है.

कृषि पर प्रभाव
बारिश न होने से सबसे पहला और सीधा असर फसलों पर पड़ता है. सूखे के कारण धान, गन्ना, सोयाबीन, मक्का आदि फसलें प्रभावित होती हैं. मिट्टी में नमी की कमी होने से फसलें ठीक से पनप नहीं पातीं और उनकी उत्पादन क्षमता घट जाती है. इससे किसानों की मेहनत पर पानी फिर जाता है और उनकी आमदनी घट जाती है.

जल स्रोतों पर प्रभाव
बारिश की कमी से जल स्रोतों जैसे नदियां, तालाब, और कुएं सूखने लगते हैं. जल का स्तर घटने से सिंचाई की समस्याएँ बढ़ जाती हैं और किसानों को वैकल्पिक जल स्रोतों पर निर्भर होना पड़ता है. कई बार उन्हें ऊंची कीमतों पर पानी खरीदना पड़ता है, जो उनकी आर्थिक स्थिति पर और दबाव डालता है.

आर्थिक संकट
बारिश न होने से फसलें बर्बाद होने की स्थिति में किसान भारी आर्थिक संकट में घिर जाते हैं. कर्ज़ का बोझ बढ़ता जाता है और उनके पास इसे चुकाने का कोई साधन नहीं बचता. इससे आत्महत्या के मामलों में भी वृद्धि देखने को मिलती है. सरकारी सहायता और बीमा योजनाएं भी पर्याप्त नहीं होतीं या समय पर नहीं पहुंच पातीं.

परिवारिक और सामाजिक प्रभाव
किसान परिवारों के जीवन पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ता है. आर्थिक तंगी के कारण बच्चों की शिक्षा प्रभावित होती है और उनकी सेहत पर भी असर पड़ता है. परिवार के सदस्यों को मजबूरन शहरों की ओर पलायन करना पड़ता है, जिससे ग्रामीण समाज की संरचना भी प्रभावित होती है.

सरकारी उपाय और सुझाव
सरकार को चाहिए कि वह किसानों के लिए स्थायी समाधान निकाले. जल संरक्षण की तकनीकों को बढ़ावा दिया जाए, जैसे रेनवाटर हार्वेस्टिंग और ड्रिप इरिगेशन. किसानों को समय पर और पर्याप्त बीमा कवरेज मिले, जिससे उन्हें आर्थिक संकट से उबारा जा सके। इसके अलावा, किसानों को आधुनिक कृषि तकनीकों और फसलों के विविधीकरण के बारे में प्रशिक्षित किया जाए, ताकि वे सूखे की स्थिति में भी अपनी आजीविका सुरक्षित रख सकें.


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लेखक के बारे में

Author: Dashmat Soren

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