बड़कागांव : हजारीबाग जिले के बड़कागांव प्रखंड की कांडतरी पंचायत स्थित विष्णुपद मंदिर सावन और भादो के महीने में श्रद्धा और आस्था का प्रमुख केंद्र बन जाता है. यहां पहुंचने वाले श्रद्धालुओं के लिए एक खास धार्मिक मान्यता जुड़ी हुई है. मान्यता है कि पहले बुढ़वा महादेव पहाड़ पर स्थित भोलेनाथ को जल चढ़ाने और इसके बाद कांडतरी स्थित विष्णुपद मंदिर में पूजा करने से मनोकामना पूरी होती है. यही वजह है कि सावन-भादो में दोनों धार्मिक स्थलों पर श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ जाती है.
250 मीटर ऊंचे पहाड़ पर मिली थी विष्णु चरण की प्रतिमा
विष्णुपद मंदिर से जुड़ी कहानी भी बेहद रोचक है. मंदिर के मुख्य पुजारी चित्र दयाल महतो के अनुसार वर्ष 2004 में क्षेत्र में बारिश नहीं होने से ग्रामीण चिंतित थे. इसी दौरान ग्रामीणों ने डुमारो गुफा स्थित रानीदह में खीर बनाकर पूजा-अर्चना की. पूजा के लिए करीब 35 ग्रामीण 250 मीटर ऊंचे पहाड़ पर पहुंचे थे.
इसी दौरान वहां ग्रामीणों को गोमेद पत्थर से बनी भगवान विष्णु के चरणों की प्रतिमा मिली. ग्रामीणों के लिए यह घटना किसी धार्मिक संकेत से कम नहीं थी. बताया जाता है कि प्रतिमा मिलने के बाद ही बारिश शुरू हो गयी. इसके बाद ग्रामीणों ने भगवान विष्णु के चरणों की प्रतिमा को कांडतरी में स्थापित किया और यहां विष्णुपद मंदिर की परंपरा शुरू हुई.
तब से बुढ़वा महादेव में जलाभिषेक करने के बाद श्रद्धालु कांडतरी स्थित विष्णुपद मंदिर पहुंचकर पूजा-अर्चना करते हैं. सावन पूर्णिमा और भादो अष्टमी के अवसर पर यहां विशेष पूजा का आयोजन होता है.
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एक साथ कई धार्मिक स्थलों के दर्शन
कांडतरी और आसपास का इलाका धार्मिक आस्था के कई केंद्रों को अपने में समेटे हुए है. श्रद्धालु विष्णुपद मंदिर के अलावा बुढ़वा महादेव मंदिर, हनुमान मंदिर, द्वारपाल गुफा, छगरी गोदरी गुफा, शिव मठ और डुमारो गुफा में भी पूजा-अर्चना करते हैं.
बुढ़वा महादेव विकास सेवा समिति के अध्यक्ष सुरेश महतो ने बताया कि इन धार्मिक स्थलों पर शिवलिंग की स्थापना 17वीं शताब्दी में कर्णपुरा राज के राजा दलेल सिंह द्वारा करायी गयी थी. इस कारण क्षेत्र के धार्मिक स्थलों का इतिहास भी काफी पुराना माना जाता है.
महिलाओं के योगदान से आकार लिया विष्णुपद मंदिर
विष्णुपद मंदिर के निर्माण में स्थानीय महिलाओं की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही. मंदिर निर्माण में जिला परिषद सदस्य सुनीता देवी, कौशल्या कुमारी, कलावती देवी, भागीरथी देवी, झालो देवी, रीता देवी, विनीता देवी, मालती देवी, उषा देवी, कुवरिया देवी, आरती देवी, संगीता कुमारी, फूलमती देवी, मंजू देवी और समुद्री देवी समेत अन्य महिलाओं ने योगदान दिया.
आज यह मंदिर केवल पूजा-अर्चना का स्थल नहीं, बल्कि स्थानीय आस्था, लोकविश्वास और धार्मिक इतिहास की एक अनूठी कहानी को भी अपने भीतर समेटे हुए है. सावन और भादो में जब श्रद्धालु बुढ़वा महादेव में जल चढ़ाकर विष्णुपद पहुंचते हैं, तो वर्षों पुरानी इस परंपरा की कड़ी एक बार फिर जीवंत हो उठती है.
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