जमीनी विवाद के कारण 15 महीने से छह करोड़ की लागत से बन रहा आवास योजना अधर में

पदमा प्रखंड सह अंचल कार्यालय के अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए आवास निर्माण का कार्य पिछले पंद्रह महीनों से ठप पड़ा हुआ है

पदमा प्रखंड सह अंचल कार्यालय के अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए आवास निर्माण का कार्य पिछले पंद्रह महीनों से ठप पड़ा हुआ है. यह मामला जमीनी विवाद और न्यायालयीय आदेश के कारण अधर में लटका हुआ है. अप्रैल 2024 में ग्रामीण विकास विशेष प्रमंडल हजारीबाग विभाग द्वारा लगभग छह करोड़ रुपये की लागत से इस परियोजना की शुरुआत की गई थी. संवेदक ने चहारदीवारी और भवन निर्माण का काम भी शुरू कर दिया था और लगभग एक करोड़ रुपये का भुगतान हो चुका था. लेकिन रोमी गांव निवासी भूपेंद्र मेहता द्वारा दायर याचिका पर हाईकोर्ट ने 5 अक्तूबर 2024 को निर्माण कार्य पर रोक लगा दी.

याचिकाकर्ता का पक्ष

भूपेंद्र मेहता का दावा है कि जिस भूमि पर आवास निर्माण हो रहा है, वह उनकी है. यह जमीन खाता संख्या दो में दर्ज है और 2007-08 तक उसकी रसीद भी कटी है. उनका कहना है कि बिना जांच किये पदमा अंचल ने इस भूमि को बंजर बताकर आवास निर्माण के लिए हस्तांतरित कर दिया. याचिकाकर्ता का यह भी कहना है कि 1988 में कोर्ट ने पहले ही उनके पक्ष में फैसला दिया था. नक्शा और प्लॉट नंबर में भी गड़बड़ी बतायी गयी है-खाता एक का प्लॉट 429 आवंटित किया गया है, जबकि नक्शा प्लॉट 381/429 का काटा गया है.

प्रशासन का पक्ष

सीओ मोतीलाल हेंब्रम ने बताया कि कोर्ट ने दो मुख्य सवालों पर जवाब मांगा था. पहला, वन विभाग से अनापत्ति प्रमाण-पत्र (एनओसी) लेना और दूसरा, पहले से बने सीओ आवास के बावजूद नया आवास निर्माण का औचित्य. सीओ ने कहा कि वन विभाग से अनापत्ति प्रमाण-पत्र लेकर रिपोर्ट भेज दी गयी है. साथ ही, पुराने सीओ आवास की स्थिति पर भी रिपोर्ट तैयार कर दी गई है. उनका कहना है कि लगभग दस साल पहले बना सीओ आवास अब जर्जर हो चुका है. नया आवास सभी अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए संयुक्त रूप से बनाया जा रहा है ताकि सुरक्षा और आवागमन की दृष्टि से सुविधा हो. भूमि को सरकारी बताया गया है और सभी कागजात की जांच के बाद ही हस्तांतरण किया गया है.

पुराने भवनों की स्थिति

प्रखंड कार्यालय के समीप लगभग दस साल पहले 15 लाख रुपये की लागत से दो मंजिला सीओ आवास का निर्माण हुआ था. लेकिन निर्माण के बाद से अब तक किसी भी सीओ ने उसमें निवास नहीं किया. भवन वीरान पड़ा रहा और पानी टंकी, मोटर, पंखा सहित कई सामान चोरी हो गये. हल्की मरम्मत से यह भवन आज भी रहने लायक है. इसी परिसर में लगभग पांच साल पहले 40 लाख रुपये की लागत से तहसील कचहरी भवन भी बनाया गया था.

विवाद का प्रभाव

निर्माण कार्य रुक जाने से प्रखंड और अंचल के अधिकारी-कर्मचारी आवास सुविधा से वंचित हैं. प्रखंड मुख्यालय में कोई भी कर्मचारी स्थायी रूप से नहीं रह रहा है. इससे प्रशासनिक कार्यों पर भी असर पड़ रहा है. लगभग छह करोड़ की लागत वाली योजना अधर में लटकी हुई है और अब तक कोर्ट में प्रशासन की ओर से पूर्ण जवाब दाखिल नहीं किया गया है.

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Author: VIKASH NATH

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