कुड़मी समाज को एसटी में सूचीबद्ध की मांग 75 वर्ष पुरानी : शीतल ओहदार

रविवार को हजारीबाग के संत कोलंबा मैदान में बृहद झारखंड कुड़मी समन्वय समिति द्वारा कुड़मी महाधिकार महारैली का आयोजन किया गया.

कुड़मी महाधिकार महारैली: हजारीबाग में एकजुटता और अधिकारों की हुंकार 2हैज20में- मंच पर उपस्थित मुख्य अतिथि व अन्य 2हैज21में- उपस्थित भीड़ 2हैज22में- पारंपरिक नृत्य बरदखूंटा कार्यक्रम का दृश्य प्रस्तुत करते 2हैज23में- पारंपरिक ढोल नगाड़ा बजाते कलाकार. 2हैज24में- मैदान में जुटी भीड़ हजारीबाग. रविवार को हजारीबाग के संत कोलंबा मैदान में बृहद झारखंड कुड़मी समन्वय समिति द्वारा कुड़मी महाधिकार महारैली का आयोजन किया गया. इस रैली का उद्देश्य कुड़मी समाज की तीन प्रमुख मांगों को लेकर सरकार का ध्यान आकर्षित करना था: कुड़मी जनजाति को अनुसूचित जनजाति (एसटी) में पुनः शामिल करना, कुड़माली भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान देना, और सरना धर्मकोड को लागू करना. रैली की अध्यक्षता देवकी महतो ने की और संचालन संजय महतो ने किया. मुख्य अतिथि समिति के केंद्रीय अध्यक्ष शीतल ओहदार ने कहा कि कुड़मी समाज की यह मांग 75 वर्षों से लंबित है. 1913 में कुड़मी समाज अनुसूचित जनजाति में शामिल था, लेकिन 1950 में इसे सूची से हटा दिया गया. अब समाज एकजुट होकर अपने अधिकारों की पुनः प्राप्ति के लिए संघर्ष कर रहा है. उन्होंने चेतावनी दी कि यदि केंद्र सरकार ने मांगें नहीं मानीं, तो पांच लाख लोग जंतर मंतर पर आंदोलन करेंगे. कुमेश्वर महतो ने कहा कि सरकार को कुड़मी समाज की ताकत और एकजुटता के आगे झुकना पड़ेगा. चंद्रनाथ भाई पटेल ने कहा कि समाज केवल अपनी ऐतिहासिक पहचान की पुनः मान्यता चाहता है. रैली में हजारों महिला-पुरुषों की भागीदारी रही. वक्ताओं में प्रो. भुवनेश्वर महतो, दाहो महतो, मोहन महतो, राजलाल महतो, अभिषेक कुमार महतो, थानेश्वर महतो, दिनेश्वर महतो, रामटहल महतो, परमेश्वर महतो, नीलकंठ महतो, बालकुमार महतो, रवींद्र महतो, किशुन महतो, पारसनाथ महतो, कपिलदेव महतो, चौलेश्वर महतो, मनोज मंजीत, तेजु महतो, रवि महतो, उतम महतो, रौशन पटेल, विकास महतो, लक्ष्मीकांत चौधरी आदि शामिल थे. रैली में पारंपरिक बरदखूटा कार्यक्रम भी हुआ, जिसमें छउ नृत्य, सोहराय चाइचंर, ढोल-मांदर की गूंज और झूमर नृत्य ने माहौल को जीवंत बना दिया. खोरठा गायकों लाली पटेल और विकास रंगीला ने मनमोहक गीत प्रस्तुत किये. यह आयोजन कुड़मी समाज की सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक एकजुटता का प्रतीक बन गया.

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Published by: Vikash nath

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