भाषा हमारी सोच, दर्शन और विश्वास का आइना : पद्मश्री प्रो अन्विता अब्बी

विभावि में तीन दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार शुरू

हजारीबाग. विनोबा भावे विश्वविद्यालय में तीन दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार गुरुवार को स्वामी विवेकानंद सभागार में शुरू हुआ. उदघाटन मुख्य अतिथि पद्मश्री प्रो अन्विता अब्बी, रणेंद्र और कुलपति प्रो चंद्रभूषण शर्मा ने संयुक्त रूप से किया. सेमिनार का विषय था-विजन 2047 जनजातीय भाषा संस्कृति एवं भारतीय ज्ञान परंपरा. प्रो अन्विता अब्बी ने कहा कि भाषा हमारी सोच, दर्शन और विश्वास का आइना होता है. जनजातियों की सोच क्या है. यह उनकी भाषा के अध्ययन से समझा जा सकता है. भाषा को उनकी दृष्टि से देखा जाये. भाषा को केवल व्याकरण के नियम से नहीं, उसमें कितना ज्ञान छिपा हुआ है, उसे देखें. किसी भाषा का लुप्त होने का मतलब है समझने की शक्ति का समाप्त होना. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और चैट-जीपीटी के लिए जो नयी डिजिटल भाषाओं का विकास किया जा रहा है, उसमें यदि जनजातीय भाषाओं के ज्ञान को शामिल किया जाये, तो ऐसी भाषाएं परिपक्वता के साथ विकसित होंगी. मुंडारी जैसी ऑस्ट्रो-एशियाई भाषा संस्कृत से भी पुरानी है. डिजिटल प्रविधि में संस्कृत से ज्यादा सुसंगत है. उन्होंने कहा कि भाषा अपने आप नहीं मरती, उसे मार दिया जाता है. जनजातीय भाषाओं को हमने दूर किया है. इसलिए यह भाषाएं देश की प्रगति में प्रभावी रूप से योगदान नहीं कर पा रही हैं. उन्होंने कहा कि भारत में वर्तमान में 1369 भाषाएं हैं, जिसमें से लगभग 800 भाषाएं वाचक हैं.

ऋग्वेद काल से संस्कृत पर मुंडारी का स्पष्ट प्रभाव : रणेन्द्र

विशिष्ट वक्ता रणेन्द्र ने संस्कृत एवं मुंडारी भाषा के अंतर-संबंधों को बताया. उन्होंने कहा कि ऋग्वेद काल से संस्कृत पर मुंडारी का प्रभाव स्पष्ट दिखता है. संस्कृत के माध्यम से कई अन्य भारतीय भाषाओं पर मुंडारी का प्रभाव पड़ा. उन्होंने भारतीय भाषाओं पर मानस के उपनिवेशीकरण का प्रभाव पर चर्चा की. उन्होंने बताया कि कैसे मुंडारी के शब्द दूसरी भाषाओं में उसी रूप में परिवर्तन कर शामिल किये गये हैं. उन्होंने ओल्ड टेस्टामेंट के फैमिली थ्योरी को खारिज करते हुए स्पेक्ट्रम थ्योरी को अधिक प्रामाणिक बताया.

भाषा के लुप्त हो जाने से मानवता को क्षति : कुलपति

विभावि कुलपति प्रो चंद्र भूषण शर्मा ने बताया कि भाषा केवल वह नहीं है, जो हम कहते हैं. भाषा वह है जो हम हैं. उन्होंने कहा कि भाषा केवल व्याकरण नहीं है, यह हमारे मानवीय होने का प्रमाण है. भाषा के लुप्त हो जाने से मानवता को क्षति होगी. कुलपति ने कहा की नयी शिक्षा नीति इस सोच पर आधारित है कि हमें किसी पर कोई भाषा आरोपित नहीं करना है. विश्वविद्यालय की लगातार कोशिश है कि बड़े-बड़े विद्वानों को व्याख्यान के लिए आमंत्रित करे.

अतिथियों की आलेख पुस्तिका का लोकार्पण

सेमिनार में अतिथियों की आलेख पुस्तिका का लोकार्पण किया गया. सेमिनार की अध्यक्षता कुलपति ने की. स्वागत संबोधन कुलसचिव डॉ प्रणिता ने किया. विषय प्रवेश आयोजन सचिव डॉ विनोद रंजन ने कराया. आयोजन संयोजक प्रो मिथिलेश कुमार सिंह ने आभार ज्ञापित किया. संचालन डॉ सुनील कुमार दुबे एवं डॉ अरुण कुमार मिश्रा ने किया.

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By SUNIL PRASAD

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