Ground Report : तेतरकोना में चलने के लिए सड़क नहीं, बरसात में गांव में ही कैद हो जाते हैं ग्रामीण

गुमला के तेतरकोना गांव में सड़क न होने से ग्रामीण परेशान हैं. बरसात में खेत की पगडंडियों से गुजरना मुश्किल है, मरीज को कंधे पर ढोकर ले जाना पड़ता है.

गुमला. आजादी के 80 साल बाद भी, गुमला जिला के कई गांवों में ग्रामीणों के चलने के लिए सड़क नहीं है. ऐसे ही गांवों में एक गांव रायडीह प्रखंड के जरजट्टा पंचायत अंतर्गत तेतरकोना है. प्रखंड मुख्यालय रायडीह से गांव की दूरी करीब 24 किमी है. जहां 15 परिवार के लोग निवास करते हैं. इस गांव की सबसे प्रमुख समस्या सड़क है. गांव के लोग सड़क की समस्या को गांव और गांववासियों के विकास में सबसे बड़ा बाधक बतातें हैं. किसान बहुल इस गांव के लोग सड़क नहीं होने का खामियाजा भुगत रहे हैं.

चलने के लिए खेत की पगडंडियां और खेत हैं

गांव के लोग आवागमन के लिए जिस रास्ते का उपयोग करते हैं. वह सड़क कच्ची है. बारिश में उस सड़क की हालत और भी ज्यादा खराब हो गयी है. खराब भी इतनी कि उसमें कीचड़ का दलदल बन जाती है, जिससे पैदल चलना भी मुश्किल हो जाता है, और बाइक तो दूर की बात है. जगह-जगह पर सड़क की चौड़ाई भी कम-ज्यादा है. गांव के बाहर निकलने के बाद सड़क खत्म हो जाती है. इसके बाद चलने के लिए खेत की पगडंडियां और खेत है. लेकिन अभी खरीफ मौसम में किसानों ने खेतों में धान की खेती है.

ऐसे में, बारिश के कारण ग्रामीणों का आवागमन लगभग बंद हो जाता है. बेहद ज़रूरी होने पर ही वे खेतों के किनारे से होकर बाहर निकलते हैं. हालांकि, गांव के लोग रायडीह बीडीओ और पंचायत के मुखिया से अनेकों बार सड़क बनवाने की गुहार लगा चुके हैं. लेकिन, दुर्भाग्य ही है कि अनेकों गुहार के बाद भी अब तक गांव के लोग सड़क की समस्या से जूझ रहे हैं. सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, इस सड़क को बनाने के लिए कोई सरकारी योजना अभी तक स्वीकृत नहीं हुई है, न ही पूर्व में इसका कोई सर्वे कराया गया है.

मरीज को बहंगी में ढो कर मेन रोड तक ले जाते हैं ग्रामीण

बीमारों को कंधे पर बहंगी में ढो कर दो किमी पैदल चल मेन रोड तक ले जाना पड़ता है. कच्ची, उबड़-खाबड़ पगडंडियों पर दो किलोमीटर तक बहंगी में मरीज को ले जाना, हर कदम पर एक संघर्ष होता है. कच्ची सड़क के कारण सबसे ज्यादा परेशानी किसानों को हो रही है. किसानों को खेतों में उत्पादित अपने फसलों को बाजार तक पहुंचाने में काफी दिक्कत हो रही है. बच्चों को भी रोज स्कूल आना-जाना करना पड़ रहा है. ऐसे में यदि गांव से किसी मरीज को अस्पताल पहुंचाना है तो सड़कविहीन गांव से निकलना कितना दिक्कतों भरा हो सकता है, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है. सड़क नहीं होने के कारण एंबुलेंस या अन्य वाहन तो गांव तक पहुंचने से रहे. ग्रामीण बतातें हैं कि वे मरीज को कंधे पर बहंगी में ढो कर दो किमी पैदल चलकर मेन रोड तक ले जाते हैं. इसके बाद गाड़ी से अस्पताल ले जाते हैं.

ग्रामीणों का मुख्य रास्ता: खेत और पगडंडियां

गांव की ललिता देवी, अनिता देवी सहित अन्य ग्रामीण बतातें हैं कि गांव की कच्ची सड़क की हालत बरसात में काफी खराब हो गयी है. गांव से मेन रोड की दूरी करीब दो किमी है. हमारे गांव तक चार चक्का वाहन जाने के लिए रास्ता नहीं है. मेन रोड से गांव तक जाने के लिए खेत और पगडंडियों से होकर गुजरना पड़ता है. गांव पहुंचने के बाद गांव की सड़क भी ठीक नहीं है. गर्मी और ठंड के मौसम में तो पैदल या बाइक से आन-जाना कर लेते हैं. लेकिन बरसात में तो गांव में ही कैद होकर रह जाना पड़ता है.

बीडीओ-मुखिया से गुहार लगाने के बाद भी नहीं बन रही सड़क

ग्रामीण बतातें हैं कि वे रायडीह बीडीओ व पंचायत के मुखिया से अनेकों बार सड़क बनाने की तत्काल मांग कर चुके हैं. लेकिन आज तक उनके द्वारा सड़क बनाने की दिशा में कोई पहल तक नहीं किया गया. आज भी कच्ची सड़क पर ही चलना पड़ रहा है. ग्रामीणों ने उपायुक्त गुमला से सड़क बनवाने की गुहार लगायी है. ग्रामीणों ने कहा कि सड़क के अभाव में गांव और गांववासियों को विकास नहीं हो पा रहा है. अनेकों तरह की समस्याओं का भी सामना करना पड़ रहा है.

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प्रशासन को गांव की समस्या पर ध्यान देने की जरूरत : कमल

युवा समाजसेवी कमल किशोर पहान ने गांव की समस्या पर चिंता जाहिर किया. उन्होंने कहा कि आज के समय में दुनिया कहां से कहां पहुंच गयी है. लेकिन तेतरकोना गांव सड़क जैसी समस्या से जूझ रहा है. प्रशासन और पंचायत के जनप्रतिनिधि गांव की प्रमुख समस्या को जानकर भी समाधान की दिशा में पहल तक नहीं कर रहे. यह उपेक्षा चिंताजनक है. उन्होंने प्रशासन से गांव की सड़क की समस्या पर संज्ञान लेने और सड़क बनवाने की मांग की है.

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लेखक के बारे में

By दुर्जय पासवान

दुर्जय पासवान ने वर्ष 2001 से पत्रकारिता की शुरुआत की. दैनिक जागरण में दो साल काम करने के बाद 2003 में वे प्रभात खबर से जुड़े. इसके साथ ही नयी दुनिया अखबार, प्रहार मैगजीन में भी अपनी सेवा दी. इसके बाद 2010 में वे दैनिक भास्कर गुमला का ब्यूरो इंचार्ज के रूप में काम शुरू किये. भास्कर में पांच साल सेवा देने के बाद दोबारा 2014 में प्रभात खबर में ब्यूरो इंचार्ज के रूप में वापसी की. तब से अबतक प्रभात खबर से जुड़े हुए हैं. उन्होंने नक्सलियों से जुड़ी खबरें, नक्सली घटनाएं, ग्राउंड रिपोर्ट, प्राचीन और ऐतिहासिक धरोहरों की खोज से संबंधित खबरों पर अच्छा काम किया. इन्हीं खबरों ने उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में पहचान दी. दुर्जय पासवान बहुत लगन से अपना सभी काम का पूरा करते हैं.

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