गुमला में बड़े स्तर की फुटबॉल प्रतियोगिता बंद होने से खिलाड़ी मायूस

गुमला में 16 वर्षो तक वर्ष 1984 से लेकर वर्ष 2000 तक फुटबॉल खेल चरम पर था. उस समय गुमला जिला की तूती बोलती थी.

दुर्जय पासवान, गुमला

गुमला में 16 वर्षो तक वर्ष 1984 से लेकर वर्ष 2000 तक फुटबॉल खेल चरम पर था. उस समय गुमला जिला की तूती बोलती थी. गुमला की टीम जिस जिला व राज्य में फुटबॉल खेलने जाती थी. गुमला की टीम जीतती थी. गुमला पहुंचने पर खिलाड़ियों का भव्य स्वागत होता था. परंतु, जैसे जैसे समय बदला. फुटबॉल खेल में राजनीति घुसते चली गयी. क्योंकि, राजनीति से जुड़े लोग इसमें हावी होने लगे. जिसका परिणाम है. अब गुमला में फुटबॉल की सभी बड़ी प्रतियोगिता बंद हो गयी. जिला स्तर पर प्रतियोगिता बंद हुई तो ग्रामीण इलाकों में खस्सी के नाम पर प्रतियोगिता शुरू हो गयी. खेल के प्रति रूचि रखने वाले खिलाड़ी मजबूरी में अब खस्सी प्रतियोगिता खेल रहे हैं. गर्मी खत्म होते ही गुमला में फुटबॉल खेल गांव-गांव व प्रखंड स्तर में होने शुरू हो जायेगी. यहां बता दें कि गुमला जिले में वर्ष 1984 में जिला फुटबॉल संघ का गठन हुआ था. उस समय गुमला के उपायुक्त द्वारिका सिन्हा थे, जो फुटबॉल खेल में काफी रूचि रखते थे. उनकी पहल के बाद गुमला में जिला फुटबॉल लीग खेल की शुरूआत हुई. जिसका असर है. उस समय संत इग्नासियुस स्कूल की टीम टॉप में मानी जाती थी. फादर पीपी वनफल, फादर जेम्स लकड़ा, फादर लाजरूस मिंज (अब तीनों स्वर्गीय) ने फुटबॉल खेल को गुमला तक ही सीमित नहीं रखा था. बल्कि इस खेल को गुमला से निकालकर राज्य व देश स्तर तक ले गये थे. वे लगातार खिलाड़ियों पर मेहनत कर रहे थे. जिसका परिणाम था. उस समय कई होनहार खिलाड़ी निकले. इधर, गुमला में फुटबॉल खेल के बंद होने के बाद खिलाड़ी मायूस हैं. खिलाड़ियों ने गुमला प्रशासन व सांसद से अपील की है कि पहल कर गुमला में एक बार पुन: फुटबॉल खेल की शुरुआत की जाये. साथ ही जो लोग राजनीति करते हैं. वैसे लोगों को कमेटी से दूर रखा जाये.

गुमला के पहले सचिव ने कहा

जिला फुटबॉल संघ गुमला के प्रथम सचिव मुरली मनोहर प्रसाद ने कहा है कि गुमला में सबसे पहले जिला फुटबॉल संघ का गठन 1984 में हुआ था. उस समय संघ के अध्यक्ष तत्कालीन उपायुक्त द्वारिका सिन्हा थे. जिसमें सचिव के पद में मुरली मनोहर प्रसाद थे. जिसके सफल संचालन के लिए मेंबर के रूप में फादर पीपी बंनफल, ओमप्रकाश गोयल, आशिक अंसारी, देव सागर सिंह, ओमप्रकाश चौरसिया, पीटर बाखला, एसएन होदा, फादर जेम्स लकड़ा समेत अन्य थे. उस समय रेफरी सुशील कुमार वर्मा थे. संघ को बिहार फुटबॉल एसोसिएशन से मान्यता प्राप्त हुआ था. गुमला जिले के स्थानीय बच्चे व पूरे बिहार से खिलाड़ी खेलने आते थे. जिसका संचालन वर्ष 2007 तक हुआ था. वहीं 1988 में ऑल इंडिया कार्तिक उरांव फुटबॉल प्रतियोगिता का आयोजन हुआ जो राज्य स्तरीय था. वहीं 1989 में अखिल भारतीय स्तर पर इसे मान्यता प्राप्त हुआ. जिसमें सभी राज्य से लोग खेलने आते थे. परंतु, हाल के वर्षो में ये सभी प्रतियोगिता बंद हो गयी. जिस कारण खिलाड़ियों को आगे बढ़ने का अवसर नहीं मिला.

स्टेडियम की मरम्मत में करोड़ों खर्च

गुमला में परमवीर अलबर्ट एक्का स्टेडियम है. इसी स्टेडियम में सभी प्रकार का खेल होता है. परंतु, यह स्टेडियम इंजीनियरिंग विभाग के लिए सोने का खजाना से कम नहीं है. क्योंकि, हर एक दो साल में स्टेडियम की मरम्मत के नाम पर लाखों रुपये खर्च कर दिया जाता है. परंतु, आज भी स्टेडियम में जो बदलाव होना चाहिए. वह नहीं हो सका है. इधर, पुन: लाखों रुपये की लागत से स्टेडियम की मरम्मत हो रही है. मरम्मत के नाम पर एक साल से स्टेडियम को लोगों के लिए बंद कर दिया गया है. जिससे खिलाड़ियों के अलावा गुमला के लोगों को परेशानी हो रही है. अधिकारी खेल में ज्यादा रूचि दिखाते नजर नहीं आ रहे हैं. यही वजह है. गुमला में बड़े लेबल पर फुटबॉल के आयोजन करने की पहल कभी नहीं की गयी.

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Author: DEEPAK

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