गुमलाः 26 जुलाई को मनाए जाने वाले करगिल विजय दिवस पर देश उन वीर जवानों को याद करता है, जिन्होंने मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी. गुमला जिले के तीन वीर सपूतों ने भी वर्ष 1999 के करगिल युद्ध में देश की रक्षा करते हुए वीरगति प्राप्त की थी. लांस हवलदार जॉन अगस्तुस एक्का, हवलदार बिरसा उरांव और लांस नायक विश्राम मुंडा की शहादत को आज भी जिले के लोग गर्व और सम्मान के साथ याद करते हैं.
भारत और पाकिस्तान के बीच वर्ष 1999 में कश्मीर के करगिल क्षेत्र में लड़ा गया युद्ध भारतीय सेना के अदम्य साहस और वीरता का प्रतीक है. इस युद्ध में गुमला के इन तीन जवानों ने दुश्मनों का मुकाबला करते हुए देश के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया था. इनके अलावा जिले के कई अन्य जवानों ने भी करगिल युद्ध में हिस्सा लेकर देश की रक्षा में योगदान दिया था. शहीदों के परिजनों ने युद्ध के दौरान की परिस्थितियों और अपने वीर सपूतों के साथ हुई आखिरी बातचीत की यादें साझा कीं.
क्रिसमस के दिन लौटने का वादा कर गये थे जॉन अगस्तुस एक्का
रायडीह प्रखंड की परसा पंचायत स्थित तेलया गांव निवासी लांस हवलदार जॉन अगस्तुस एक्का करगिल युद्ध में शहीद हुए थे. जॉन अगस्तुस एक्का के दो पुत्र हैं. परिजनों के अनुसार युद्ध के लिए रवाना होते समय उन्होंने अपनी पत्नी से कहा था कि वह 25 दिसंबर को क्रिसमस के दिन घर लौटेंगे. लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था.
करगिल युद्ध शुरू होने के बाद पूरा परिवार चिंता और डर के माहौल में था. उस समय मोबाइल और फोन की सुविधा नहीं होने के कारण शहादत की सूचना काफी देर से मिली. जब परिवार को उनके वीरगति प्राप्त करने की जानकारी मिली, तो पूरे गांव में शोक की लहर दौड़ गई. उनका पार्थिव शरीर 6 दिनों बाद गांव लाया गया था.
शहीद की पत्नी ने बताया कि पति के बलिदान के बाद परिवार को केवल पेंशन का लाभ मिला. नाम में गड़बड़ी के कारण करीब ढाई साल तक पेंशन बंद रही, जिसे बाद में ठीक कराया गया. उन्होंने सरकार से परिवार की सहायता की अपील की है.
आखिरी खत में बिरसा उरांव ने दिया था जल्द लौटने का भरोसा
सिसई प्रखंड के जतराटोली शहिजाना के बेर्री गांव निवासी हवलदार बिरसा उरांव भी करगिल युद्ध के वीर शहीदों में शामिल थे. वह बिहार रेजिमेंट में तैनात थे और ऑपरेशन विजय के दौरान दो सितंबर 1999 को शहीद हुए थे. उनकी पत्नी मिला उरांव ने बताया कि युद्ध के समय पत्र ही बातचीत का एकमात्र माध्यम था. शहीद होने से कुछ दिन पहले बिरसा उरांव का आखिरी खत मिला था, जिसमें उन्होंने जल्द घर लौटने की बात लिखी थी. लेकिन उनका यह वादा पूरा नहीं हो सका.
पत्नी मिला उरांव ने बताया कि आज भी उनके गांव बेर्री का अपेक्षित विकास नहीं हो पाया है. उन्होंने प्रशासन से गांव को सरकारी योजनाओं से जोड़ने और विकास कार्य कराने की मांग की है.
विश्राम मुंडा का नहीं मिल सका था पार्थिव शरीर
भरनो प्रखंड के नवाटोली गांव निवासी लांस नायक विश्राम मुंडा ने भी वर्ष 1999 के करगिल युद्ध में वीरता का परिचय देते हुए देश के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिये थे. परिजनों के अनुसार भारतीय सेना को उनका पार्थिव शरीर नहीं मिल सका था. बाद में उनकी अस्थियां गांव पहुंचाई गई थीं. शहीद के पुत्र ने बताया कि परिवार अपने पिता का अंतिम दर्शन तक नहीं कर सका. उन्होंने कहा कि सरकार की ओर से परिवार को अपेक्षित सहयोग नहीं मिला. अनुकंपा के आधार पर नौकरी भी नहीं मिल सकी.
हर वर्ष विजय दिवस के अवसर पर अधिकारी घर पहुंचते हैं, सम्मान देते हैं और मदद का आश्वासन देकर चले जाते हैं. शहीद विश्राम मुंडा के पुत्र ने अपने पिता की यादों को साझा करते हुए बताया कि उनके पिता अच्छे फुटबॉलर थे. छुट्टी में घर आने पर वह उनके साथ खूब खेलते थे. लेकिन देश की रक्षा करते हुए शहीद होने के बाद उन्हें अपने पिता का अंतिम दर्शन भी नसीब नहीं हुआ. गुमला के इन तीनों वीर सपूतों की शहादत आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी. देश उनकी वीरता और बलिदान को हमेशा नमन करता रहेगा.
