गुमला. लोहरदगा रोड स्थित खूबसूरत डाकघर आज आधुनिक सुविधाओं और कंप्यूटर व्यवस्था से सुसज्जित है, लेकिन इसकी दीवारों में गुमला की पुरानी डाक व्यवस्था की कई यादें समायी हैं. वरिष्ठ पत्रकार विजय आनंद के अनुसार यह डाकघर अविभाजित बिहार के समय का है. उस दौर में गुमला का डाकघर टावर चौक के समीप स्थित था. चौक के दक्षिण में एक प्रतिष्ठित मुंशी के विशाल परिसर में बने खपरैल के मकान में डाकघर संचालित होता था.
विजय आनंद बताते हैं कि इसी डाकघर के माध्यम से गुमला अनुमंडल के विभिन्न गांवों तक डाक पहुंचती थी. लिफाफे, मनीऑर्डर प्रपत्र, पोस्टकार्ड और डाक टिकट जैसी सामग्री यहीं मिलती थी. कई बार डाक सामग्री खरीदने के लिए लोगों को कतार में खड़ा होना पड़ता था. उस समय डाक विभाग का महत्व इतना अधिक था कि पालकोट रोड में भी खपरैल के मकान में डाकघर की एक शाखा संचालित होती थी.
डाकघर के साथ चलता था तारघर
बिहार सरकार के समय गुमला में नया डाकघर स्थापित किया गया, जिसके अंतर्गत लोहरदगा और सिमडेगा भी आते थे. बाद में दोनों स्थानों के डाकघर स्वतंत्र रूप से कार्य करने लगे. पुराने डाकघर परिसर में ही तारघर भी हुआ करता था. फैक्स, मोबाइल और कंप्यूटर के दौर से पहले तार के माध्यम से संदेश भेजना संचार का महत्वपूर्ण माध्यम था. तार भेजने वाले कर्मचारी को ‘तार बाबू’ कहा जाता था. मोर्स कोड पर आधारित मशीन चलाने के लिए विशेष प्रशिक्षण दिया जाता था. आज न तो वे मशीनें बची हैं और न ही उन्हें चलाने वाले जानकार.
सरकारी सूचनाओं का भी केंद्र था डाकघर
डाकघर केवल डाक के आदान-प्रदान तक सीमित नहीं था. वन विभाग की ओर से जंगलों की नीलामी से संबंधित सूचनाएं भी यहां जारी की जाती थीं. सरकारी सूचनाएं डाकघर की दीवारों पर चस्पा की जाती थीं. मैट्रिक परीक्षा के परिणाम भी अखबारों में प्रकाशित होने के बाद डाकघर की दीवारों पर लगाये जाते थे. उस समय ‘आर्यावर्त’ जैसे चर्चित अखबारों की खबरें भी लोगों के लिए सूचना का महत्वपूर्ण माध्यम थीं.
लाल डाकगाड़ी से रांची जाती थीं डाक की बोरियां
विजय आनंद पुराने दिनों की एक और रोचक याद साझा करते हैं. लाल रंग की एक यात्री गाड़ी डाकगाड़ी के रूप में चलती थी. इसी के माध्यम से डाक की बोरियां रांची भेजी जाती थीं. यह गाड़ी हैंडल लगाने से चलती थी और उसके रांची पहुंचने का समय भी निश्चित नहीं होता था. इसी तरह धीरे-धीरे डाक सामग्री का आवागमन होता था.
समय बदला, संचार के साधन बदले और डाकघर भी आधुनिक होता गया. आज वही डाकघर कंप्यूटरीकृत व्यवस्था और आधुनिक सेवाओं के साथ नये दौर में खड़ा है. लेकिन उसके पुराने दिनों की डाक, तार, कतार और लाल डाकगाड़ी की यादें गुमला के इतिहास का अहम हिस्सा बनी हुई हैं.
