सिसई से प्रफुल्ल भगत की रिपोर्ट
सिसई. एक तरफ सरकार हर मंच से शिक्षा पर करोड़ों रुपये खर्च करने का दावा करती है, लेकिन दूसरी तरफ जमीनी हकीकत सरकार के दावों को मुंह चिढ़ाती नजर आती है. सिसई प्रखंड के राजकीयकृत मध्य विद्यालय सकरौली इसकी जीती-जागती मिसाल है. यहां अपना भविष्य संवारने के लिए स्कूल आने वाले बच्चों को कमरों के अभाव में एक ही कमरे में दो-दो कक्षाओं में बैठकर पढ़ाई करनी पड़ रही है. इतना ही नहीं, कक्षा सातवीं के बच्चों को जान जोखिम में डालकर पूरी तरह जर्जर हो चुके कमरे में बैठकर पढ़ाई करनी पड़ रही है.
9 कमरों में 3 पूरी तरह जर्जर
विद्यालय में कुल नौ कमरे हैं. इनमें तीन कमरे पूरी तरह जर्जर हो चुके हैं. तीनों कमरों की छतों का प्लास्टर झड़ रहा है और सरिया बाहर दिख रहा है. बरसात होते ही छतों से पानी टपकना शुरू हो जाता है, जो बारिश थमने के घंटों बाद तक जारी रहता है. कमरों में जलजमाव की स्थिति बन जाती है.
जर्जर कमरे में बैठते हैं सातवीं के बच्चे
इन्हीं जर्जर कमरों में से एक में कक्षा सातवीं के छात्र बैठते हैं. दूसरे जर्जर कमरे को मजबूरी में एमडीएम स्टोर रूम बनाया गया है. यहां रखा चावल भीगकर खराब हो रहा है. तीसरे जर्जर कमरे को बंद कर दिया गया है. एक ठीक-ठाक कमरे में विद्यालय का कार्यालय चल रहा है. ऐसे में 262 बच्चों के लिए पढ़ाई के लिए महज चार कमरे ही बचे हैं.
262 बच्चे, शिक्षकों के भी चार पद खाली
विद्यालय के प्रधानाध्यापक मनपुरन साहू ने बताया कि विद्यालय में 262 बच्चे नामांकित हैं. शिक्षकों के स्वीकृत पद में चार की कमी है. जर्जर भवन की जानकारी कई बार विभाग को दी गयी है, लेकिन अब तक कोई ठोस पहल नहीं की गयी है.
अभिभावकों को सता रहा बड़े हादसे का डर
अभिभावकों का कहना है कि लापरवाह सरकारी स्कूल में बच्चों को पढ़ाना उनके भविष्य को अंधकार में धकेलना है. जर्जर कमरों में बच्चों के बैठने से अभिभावकों को अब हर समय हादसे का डर सताता रहता है. उनका कहना है कि यदि समय रहते भवन की मरम्मत नहीं करायी गयी, तो कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है.
