उम्मीदों में जी रहे हैं वनराज के पांच हजार ग्रामीण, कर रहे हैं तारणहार का इंतजार

नक्सल प्रभावित इलाका होने के कारण विकास कार्य नहीं हुआ. अब नक्सल खत्म हो रहा है, तो प्रशासन व नेता ने मुंह मोड़ लिया डहुपानी से लौट कर दुर्जय पासवान गुमला : जिले के पालकोट प्रखंड में डहुपानी पंचायत है. बीहड़ जंगल व पहाड़ी इलाके में पंचायत बसा है. ग्रामीण अपने को वनराज के निवासी […]

नक्सल प्रभावित इलाका होने के कारण विकास कार्य नहीं हुआ.

अब नक्सल खत्म हो रहा है, तो प्रशासन व नेता ने मुंह मोड़ लिया
डहुपानी से लौट कर दुर्जय पासवान
गुमला : जिले के पालकोट प्रखंड में डहुपानी पंचायत है. बीहड़ जंगल व पहाड़ी इलाके में पंचायत बसा है. ग्रामीण अपने को वनराज के निवासी कहते हैं. कारण, यह पूरा इलाका जंगली है, इसलिए ग्रामीण खुद को जंगल का राजा भी कहते हैं. लेकिन इस वनराज क्षेत्र के करीब पांच हजार ग्रामीण आज भी उम्मीदों में जी रहे हैं.
पूरी पंचायत को किसी तारणहार का इंतजार है, ताकि पंचायत की तकदीर व तसवीर बदल सके. यहां के लोग आज भी चुआं व नदी का पानी पीते हैं. इतने बीहड़ जंगल व पहाड़ों के बीच यह पंचायत कैसे बसा? यह अपने आप में इतिहास है.
जैसा ग्रामीण बताते हैं : कुछ लोग अंग्रेज, तो कुछ लोग जमींदारों से डर कर इस क्षेत्र में पहुंचते गये. इसके बाद एक-एक कर लोग झोपड़ीनुमा घर बना कर रहते गये. जंगली इलाका था. खाने के लिए आसानी से जंगल का उत्पाद मिल जाता था, इसलिए लोग यहीं रह गये. धीरे-धीरे आबादी बढ़ी. आज इस पंचायत में करीब पांच हजार लोग निवास करते हैं. लेकिन आज की पीढ़ी इस बात को कोस रहे हैं कि हमारे पूर्वज इतने बीहड़ जंगल में क्यों आकर बसे, क्योंकि यहां न तो शिक्षा का स्तर ठीक है न ही कोई रोजगार है.
कुछ युवक-युवती गांव के स्कूलों में पढ़ने के बाद शहर चले गये, जहां वे किराये के मकान व हॉस्टल में रह कर कॉलेज में पढ़ रहे हैं. प्रभात खबर गांव पहुंचा, तो गांव की तसवीर सामने आयी है. चलने के लिए कहीं-कहीं पर कच्ची सड़क है. कई जगह तो रास्ता नहीं है. पहाड़ पर चढ़ कर गांव जाना पड़ता है. कुछ स्थानों पर पगडंडी है. कुल मिला कर, डहुपानी व आसपास के गांवों में जाना बड़ी मुश्किल भरा सफर है.
गांव पहुंचने पर वहां के लोगों से बात की. लोगों ने पहले तो नेताओं व प्रशासनिक अधिकारियों को कोसा, क्योंकि विधायक व सांसद को आज तक पंचायत के लोग अपने गांव में नहीं देखा है. हां, इन विधायक व सांसद के कुछ एजेंट जरूर गांव में घुसते हैं. बीडीओ व सीओ भी इस पंचायत में घुसने की हिम्मत नहीं जुटा पाते. कारण, प्रशासन इस क्षेत्र में नक्सलियों के आवागमन से डरा रहता है. डर के कारण प्रशासन डहुपानी नहीं जाता है. आज भी लोगों को इस क्षेत्र के विकास के लिए किसी तारणहार का इंतजार है.

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By Prabhat Khabar Digital Desk

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