झारखंड सरकार में मंत्री रहे सुदिव्य कुमार सोनू का राजनीतिक जीवन भले ही लंबे समय तक सार्वजनिक चर्चा में रहा, लेकिन उनके परिवार का गिरिडीह से जुड़ाव करीब एक सदी पुराना बताया जाता है. उपलब्ध पारिवारिक जानकारी के अनुसार उनके दादा वर्ष 1919 में मुंगेर से गिरिडीह आये थे. लोहे के काम और रेलवे ट्रैक निर्माण में दक्ष होने के कारण अंग्रेजों के विशेष बुलावे पर उन्हें यहां लाया गया था.
उस समय गिरिडीह में बंगाल कोल कंपनी की ओर से कोयला खनन का काम किया जा रहा था. कोयले की ढुलाई के लिए बनियाडीह से मधुपुर तक रेलवे ट्रैक निर्माण की योजना थी. ट्रैक निर्माण के सिलसिले में उनके दादा अपने साथ बड़ी संख्या में मजदूरों को लेकर गिरिडीह पहुंचे थे. बाद में परिवार ने यहां जमीन खरीदी और गिरिडीह को ही अपना स्थायी ठिकाना बना लिया.
पिता बिजली विभाग में इंजीनियर, अलग-अलग जिलों में बीता बचपन
सुदिव्य कुमार सोनू के पिता बिजली विभाग में इंजीनियर थे. नौकरी के दौरान उनका पदस्थापन पूर्णिया, सहरसा, मधेपुरा, तिलैया, दुमका और पटना समेत अलग-अलग स्थानों पर हुआ. इस कारण सुदिव्य कुमार का बचपन और शुरुआती शिक्षा भी बिहार और झारखंड के अलग-अलग जिलों में हुई.
उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा तिलैया के एक विद्यालय से दी, जबकि इंटर की पढ़ाई पूर्णिया के एक कॉलेज से की. इंटर के बाद उन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए कॉलेज में दाखिला लिया, लेकिन आगे की पढ़ाई जारी नहीं रखी. इसके बाद वह गिरिडीह लौट आये.
कारोबार से राजनीति तक पहुंचा सफर
गिरिडीह लौटने के बाद उन्होंने व्यवसाय में हाथ आजमाया. शुरुआती दौर में सीसीएल, डीवीसी और एमपीसीसी में टेंडर लेकर काम किया. बाद में साझेदारी में गिरिडीह में हार्ड कोक प्लांट भी स्थापित किया.
कारोबार के साथ ही उनका सामाजिक और राजनीतिक जुड़ाव बढ़ता गया. वर्ष 1989 में वह झारखंड मुक्ति मोर्चा से जुड़े और इसके बाद सक्रिय राजनीति में उनकी भूमिका लगातार बढ़ती गयी. संगठन में काम करते हुए उन्होंने गिरिडीह में अपनी राजनीतिक पहचान मजबूत की और आगे चलकर विधानसभा चुनाव भी लड़ा.
फोटोग्राफी और वन्यजीवन से था गहरा लगाव
सुदिव्य कुमार सोनू को फोटोग्राफी का विशेष शौक था. खाली समय में वह जंगलों की ओर निकल जाते थे और वन्यजीवों की तस्वीरें लेते थे. पक्षियों से लेकर बड़े वन्यजीवों तक को कैमरे में कैद करना उन्हें पसंद था. हाल के वर्षों में जिम कॉर्बेट और रणथंभौर जैसे वन्यजीव क्षेत्रों की यात्राओं के दौरान भी उन्होंने फोटोग्राफी की.
वन्यजीव क्षेत्रों की यात्रा के दौरान वह केवल फोटोग्राफी तक सीमित नहीं रहते थे. वहां की व्यवस्थाओं और सुविधाओं को भी बारीकी से देखते थे. पारिवारिक परिचितों के अनुसार, वह वन्यजीव क्षेत्रों में शौचालय और अन्य सुविधाओं को देखकर झारखंड में भी ऐसी व्यवस्थाएं विकसित करने की बात करते थे.
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फोटोग्राफी के प्रति उनका लगाव इस बात से भी समझा जा सकता है कि उन्होंने एक विशेष वैन तैयार कर रखी थी. वह मजाकिया अंदाज में कहा करते थे कि यदि कभी चुनाव हार गये, तो कैमरा लेकर इसी वैन से जंगलों की ओर निकल जायेंगे.
खाना बनाने और किताब पढ़ने में भी थी रुचि
सुदिव्य कुमार को खाना बनाने में भी रुचि थी. वह अपने पारिवारिक पृष्ठभूमि का जिक्र करते हुए अक्सर कहते थे कि लोहार के परिवार से होने के कारण उन्हें आग के तापमान की समझ है. खाना बनाने के दौरान किस तापमान पर कौन-सा व्यंजन कितनी देर में तैयार होगा, इसकी चर्चा वह करते थे.
उन्हें किताबें पढ़ने का भी शौक था. उपन्यासों के अलावा राजनीति से जुड़ी किताबें भी पढ़ते थे. पढ़ने-लिखने की आदत के कारण भाषा पर उनकी अच्छी पकड़ बतायी जाती थी. सार्वजनिक जीवन में उनके भाषणों में कई बार अपेक्षाकृत कठिन और विशिष्ट शब्दों का इस्तेमाल भी देखने को मिलता था.
इस तरह सुदिव्य कुमार सोनू का जीवन केवल राजनीति तक सीमित नहीं था. एक पुराने कारोबारी परिवार की विरासत, अलग-अलग स्थानों में बीता बचपन, कारोबार का अनुभव, फोटोग्राफी और वन्यजीवन के प्रति रुचि तथा पढ़ने-लिखने की आदत उनके व्यक्तित्व के अलग-अलग पहलुओं को सामने लाती है.
