पतिराम मांझी के माता-पिता की उम्र अब काफी ज्यादा हो चुकी है. वहीं, उसकी पत्नी और दो बेटियां आज भी पतिराम को देखने के लिए बेचैन हैं. कहतीं हैं कि अब कम से कम अंतिम दर्शन तो हो जाये. गुरुवार को ही पुलिस मुठभेड़ में पतिराम के मारे जाने की सूचना उसके पैतृक गांव के लोगों के साथ-साथ परिजनों को मिल चुकी थी. जब प्रभात खबर की टीम पीरटांड़ के झरहा गांव पहुंची तो देखा कि गमगीन माहौल के बीच लोग पतिराम के शव का इंतजार कर रहे हैं. इसमें से कई लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने पतिराम को देखा तो नहीं, लेकिन उसके कारनामों को बखूबी जानते हैं. परिजनों के साथ-साथ ग्रामीणों ने बताया कि वर्ष 1990 के आसपास इलाके के सामंतवादियों और महाजनों के खिलाफ चल रहे आंदोलन से प्रभावित होकर पतिराम नक्सली संगठन से जुड़ गया था. वर्ष 1998 में उसकी शादी श्यामली देवी से हुई और उसके दो बच्चे भी हुए. इस बीच पुलिस ने पतिराम मांझी को नक्सल मामले में ही गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. जब वह जेल से वापस लौटा, तो देखा कि घर की आर्थिक स्थिति बेहद खराब है. साथ ही छोटी-बड़ी घटनाओं को लेकर पुलिस भी गांव में दस्तक देती थी. इन स्थितियों को देखते हुए उसने गांव छोड़ कर जाना उचित समझा. पत्नी श्यामली कहती है कि वर्ष 2002 में वह काम करने के बहाने निकला और आज तक वापस नहीं लौटा.
पत्नी ने देवर के घर रहकर बच्चों का पालन-पोषण किया
पतिराम मांझी उर्फ अनल भले ही अपने गतिविधियों के कारण एक करोड़ का इनामी नक्सली घोषित हुआ, लेकिन यह भी सच है कि उसके घर की माली हालत काफी खराब रही. आर्थिक तंगी के कारण ही पतिराम ने घर छोड़ा था और उसके परिजनों को पतिराम के अन्य दो भाइयों का सहारा मिला. पत्नी श्यामली ने बताया कि घर बिल्कुल जर्जर हो चुका था. मिट्टी का घर धंस गयास जिसके कारण वह अपने बच्चों के साथ अपने देवर के घर में चली गयी. दोनों देवर खेती-बारी के साथ-साथ दिहाड़ी मजदूरी करते थे. मिलकर खेती-बारी की और अपने दोनों बच्चों का पालन-पोषण यहीं से किया. साथ ही अपनी दोनों बेटियों की भी शादी कर दी. पिता को पेंशन तो मिलता है, लेकिन मां का बैंक खाता आज तक नहीं खुला.दोनों बेटियों को पिता का चेहरा तक याद नहीं
श्यामली से जब और विस्तृत जानकारी लेने का प्रयाास किया गया तो वह फफक-फफक कर रो पड़ी. कहा कि जीते जी इतने वर्षों से वह अपने पति से नहीं मिल सकी. उनकी दोनों बेटी भी अपने पिता का इंतजार करती रही. दोनों बेटी रानी और नीलू को अपने पिता का चेहरा तक याद नहीं है. कहती है कि दोनों बेटी को यह भी पता नहीं कि वह कब अपने पिता से मिली थी. एक बेटी की शादी नवासार और दूसरी बेटी की शादी कबरियाबेड़ा में हुई है.आज भी झरहा गांव विकास से है कोसों दूर
कुख्यात और एक करोड़ का इनामी नक्सली पतिराम मांझीउर्फ अनल का पैतृक गांव का आज भी अपेक्षाकृत विकास नहीं हो पाया है. पतिराम झरहा गांव का रहने वाला है. झरहा के साथ-साथ दीवानडीह के लोगों का कहना है कि हमलोग गांव का विकास चाहते हैं. आज भी मांझीडीह से झरहा होते हुए संघरवा पुल तक जाने वाली सड़क बेहद जर्जर है. हालांकिस सड़क का शिलान्यास पिछले वर्ष हो गया है. दर्जनों जलमीनार लगे, लेकिन सभी खराब है. दीवानडीह से झरहा को जोड़ने वाली सड़क विगत आठ वर्ष पूर्व बनी है, जो अब खराब होने लगी है. ग्रामीणों का कहना है कि आवागमन की सुविधा नहीं रहने के कारण झरहा और आसपास के गांव मुख्यधारा से कटा रहा. फलस्वरूप इस क्षेत्र में माओवादी संगठन की जड़ें काफी मजबूत रही. गांव के मंगू किस्कू समेत अन्य लोग कहते हैं कि इस बात का मलाल तो है ही कि गांव का रहने वाला पतिराम मारा गया. कहा कि उसके परिवार के लोगों ने काफी मेहनत कर अपने और अपने परिवार की गुजर बसर की है.मोबाइल से मिला बेटे की मौत की खबर
पतिराम की मां बड़की देवी की उम्र 80 वर्ष से भी अधिक हो चुकी है. वहीं, उसके पिता दुरकू मांझी उर्फ छठू उम्रदराज रहने के कारण काफी कमजोर हो चुके हैं. लाठी के सहारे चलते हैं. पतिराम के बाबत पूछने पर मां बड़की देवी कहती है कि नुनवा निकललो फिर वापस न आइलो. पतिराम के मारे जाने के सवाल पर कहती है कि मोबाइल पर नुनवा के मरे के खबर सुन लियो (पतिराम के मरने की खबर उसकी मां को मोबाइल से मिली). कहती है कि सरकार पेंशन नहीं देती है. पेंशन क्यों नहीं मिल रही है, इसका जवाब भी नहीं दे पाती है. कहती है कि बैंक में खाता नहीं है.देर रात तक नहीं पहुंचा पतिराम का शव, इंतजार करते ग्रामीण
शुक्रवार की देर रात तक पतिराम का शव नहीं पहुंचा था. देर रात तक पतिराम के परिजन व ग्रामीण शव आने का इंतेजार करते रहे. परिजनों ने बताया कि अपनों को खोने का गम तब और गहरा हो जाता है जब अंतिम विदाई के लिए घंटों लंबा इंतजार करना पड़े. कुछ ऐसा ही मंजर पतिराम के गांव में देखने को मिला, जहां देर रात तक उनका पार्थिव शरीर घर नहीं पहुंचने से परिजनों और ग्रामीणों की बेचैनी बढ़ती रही. मृतक के घर के बाहर काफी संख्या में ग्रामीण जमा थे, जो हर आहट पर सड़क की ओर टकटकी लगाए बैठे थे. प्रशासनिक या प्रक्रियात्मक देरी के कारण शव पहुंचने में हुए विलंब ने शोकाकुल परिवार की पीड़ा और बढ़ा दिया. अन्य लोगों के साथ-साथ पतिराम की दोनों बेटियों में पिता की मौत का गम साफ झलक रहा था. दोनों का पिता की मौत की खबर के बाद से ही रो-रोकर बुरा हाल था. वह अब अंतिम दर्शन चाहती है.डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है
