मुनि श्री ने कहा कि केवल जीव की मृत्यु होना हिंसा नहीं, बल्कि उसके पीछे का अशुभ भाव ही हिंसा का कारण है. मुनिश्री ने डाकू, ड्राइवर और डॉक्टर का उदाहरण देते हुए स्पष्ट किया कि हत्या की भावना से किया गया कार्य पूर्ण हिंसा है, जबकि बचाने के भाव से किए गये प्रयास में अनजाने में हुई मृत्यु को उसी दृष्टि से नहीं देखा जाता.
जैन धर्म अहिंसा को केवल बाहरी आचरण नहीं, बल्कि अंतःकरण की पवित्रता मानता है
उन्होंने कहा कि जैन धर्म अहिंसा को केवल बाहरी आचरण नहीं, बल्कि अंतःकरण की पवित्रता मानता है. उन्होंने बताया कि भगवान महावीर ने अहिंसा को महाव्रत और अणुव्रत के रूप में विभाजित किया है. गृहस्थों के लिए संकल्पी, आरंभी, उद्योगी और विरोधी हिंसा का उल्लेख करते हुए कहा कि क्रूरता, द्वेष और जानबूझकर की गई हिंसा से बचना आवश्यक है.
