विडंबना. सर्द रातें कट रहीं बिना कंबलों व अलावों के, ठंड में जमीन पर सोने को विवश
हजारीबाग रोड : सरिया प्रखंड क्षेत्र में लुप्तप्राय आदिम जनजाति की स्थिति बेहद दयनीय है. उनके कल्याण के नाम पर सरकार समय-समय पर कई प्रकार की योजना तो चलाती है, पर उनकी स्थिति यथावत है.
उनके जीवन में झांक कर देखने से पता चलता है कि उन्हें न तो भोजन मिल पा रहा है न तन ढकने को कपड़ा. शिक्षा व रोजगार से कोसों दूर बिरहोर इस कपकपांती ठंड में जमीन पर सोने को विवश हैं. मकान में दरवाजे नहीं लगे है. यह हाल सरिया प्रखंड के काला पत्थर, बिरहोर टंडा के बिरहोरों का है.
अलाव-कंबल का दरस नहीं : यहां एक प्राथमिक विद्यालय व आंगनबाड़ी केंद्र तो है, लेकिन प्रोत्साहन व जागरूकता के अभाव में बिरहोर बच्चे यहां पढ़ने नहीं आते. अमनारी बिरहोर टंडा में लोगों का जीवनस्तर निम्न है. मंगरू बिरहोर व बूधन बिरहोर ने बताया कि इस भारी ठंड में अब-तक न तो अलाव लगाया गया है और न ही कंबल दिया गया है. ये रस्सी बनाकर किसी तरह गुजर-बसर करते हैं. एनजीओ की देखरेख में कल्याणकारी योजनाओं की बात तो सुनी जाती है, पर धरातल पर कुछ नहीं दिखता.
तत्कालीन डीसी वंदना दादेल ने की थी उत्थान की कोशिश : कुछ वर्षों पूर्व गिरिडीह के तत्कालीन उपायुक्त वंदना दादेल ने इन बिरहोरों के उत्थान की दिशा में कुछ कोशिश जरूर की थी. इन बिरहोरों की स्थिति को जानने के लिए श्रीमती दादेल ने दर्जनाधिक बार यहां का दौरा किया था. इन बिरहोरों का कहना है कि उसके बाद किसी ने उनकी सुधि नहीं ली.
