राकेश सिन्हा
गिरिडीह : शिक्षक नियुक्ति प्रक्रिया शुरू होने के बाद फर्जी प्रमाण-पत्र बनाने का मामला गरमा गया है. हालांकि फर्जी डिग्रीधारियों का शिक्षक के पद पर बहाल होने का यह पहला प्रयास नहीं है. पूर्व में भी फर्जी डिग्रीधारी प्रयास करते रहे हैं. इसमें काफी संख्या में सफल भी हुए हैं.
विभागीय अधिकारियों की मिलीभगत के कारण मामला दबता गया और फर्जी डिग्रीधारी शिक्षक बनकर वेतन उठाते रहे. गौरतलब है कि दस वर्ष पूर्व ही फर्जी प्रमाण-पत्र पर नौकरी हासिल करने का न सिर्फ खुलासा हुआ था, बल्कि जांच में उसकी पुष्टि भी हो गयी थी.
ऐसे फर्जी डिग्रीधारी शिक्षकों की सेवा समाप्त कर उनके विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज तो कर ली गयी. परंतु अभी तक फर्जी प्रमाण पत्र बनाने वाले गिरोह का उदभेदन नहीं हो सका. जानकारी के अनुसार जिले में 2003 एवं 2005 में शिक्षकों की नियुक्ति हुई थी. इन शिक्षकों के शैक्षणिक एवं प्रशैक्षणिक प्रमाण पत्र की जांच करायी गयी. जिनमें प्रमाण-पत्र फर्जी पाये गये. 25 मई 2006 को तत्कालीन उपायुक्त की अध्यक्षता में बैठक हुई थी जिसके प्रस्ताव संख्या सात में सर्वसम्मति से उन शिक्षकों की सेवा समाप्ति का निर्णय लिया गया था जिनके प्रमाण पत्र फर्जी थे.
इतना ही नहीं, सभी 32 शिक्षकों पर प्राथमिकी भी दर्ज कराने का फैसला हुआ. परंतु आश्चर्य की बात यह है कि इन फर्जी डिग्रीधारी शिक्षकों की गिरफ्तारी अभी तक नहीं हुई.
यदि इन फर्जी डिग्रीधारियों को गिरफ्तार कर पूरे मामले का अनुसंधान ठीक से किया जाता तो फर्जी प्रमाण-पत्र बनाने वाले लोगों को चिन्हित कर उन्हें भी जेल भेजा जा सकता था. हालांकि मामले को लेकर शिक्षा विभाग व पुलिस विभाग ने गंभीरता नहीं दिखायी.
