संदीप कुमार की रिपोर्ट
गढ़वा. केतार के पाचाडुमर गांव के घंगरडीहा टोला में बुखार से दो बच्चों की मौत के बाद जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों के मृतकों के घर पहुंचने का सिलसिला जारी है. वहीं पड़ताल में गरीब आदिवासी परिवार की बदहाली और सरकारी योजनाओं की जमीनी हकीकत सामने आयी है. जिस परिवार को सरकारी सहायता की सबसे अधिक जरूरत है. वही कई योजनाओं के लाभ से वंचित है.
नहीं हो सका समय पर इलाज
सात वर्षीय गोलू कुमार और 10 वर्षीय सोनू कुमार दो दिनों से बीमार थे. परिजनों की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होने के कारण दोनों का समय पर इलाज नहीं हो सका और उनकी मौत हो गयी. फिलहाल बुद्धि नारायण सिंह चेरो, बसमतिया देवी, कविता, सुनीता और सुशील का इलाज भवनाथपुर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में चल रहा है.
आठ सदस्यों में पांच को ही मिल रहा राशन
करीब 70 वर्षीय बुद्धि नारायण सिंह चेरो की दो पत्नियां और पांच बच्चे हैं. परिवार में कुल आठ सदस्य हैं, लेकिन राशन कार्ड में केवल पांच सदस्यों के नाम दर्ज हैं. इस कारण मृतक दोनों भाइयों और बड़े बेटे सुशील के तीनों बेटों को सरकारी राशन का लाभ नहीं मिल रहा है. घर के अकेले कमाऊ सदस्य बुद्धि नारायण सिंह चेरो भी अस्वस्थ रहते हैं और अब मजदूरी करने की स्थिति में नहीं हैं. ऐसे में आठ सदस्यों के परिवार के लिए महीने में मिलने वाला महज 25 किलो राशन पर्याप्त नहीं है.
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आवास पूरा, 20 हजार रुपये का इंतजार
बुद्धि नारायण सिंह चेरो की पत्नी धनवा देवी के नाम अबुआ आवास स्वीकृत हुआ था. आवास पूरा कराने के प्रशासनिक दबाव के बाद परिवार ने गांव के दो लोगों से 20 हजार रुपये ब्याज पर कर्ज लेकर करीब तीन माह पहले आवास पूरा कराया. परिजनों के अनुसार अब तक आवास की करीब 20 हजार रुपये की राशि बकाया है. ब्याज समेत कर्ज का बोझ परिवार की परेशानी बढ़ा रहा है.
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कई माह से नहीं मिला मंईयां सम्मान
बुद्धि नारायण सिंह चेरो की दूसरी पत्नी बसमतिया देवी को मुख्यमंत्री मंईयां सम्मान योजना की राशि कुछ माह तक मिली, लेकिन इसके बाद कई माह से भुगतान बंद है. बसमतिया देवी का कहना है कि राशि बंद होने से परिवार की आर्थिक परेशानी और बढ़ गयी है.
बच्चों के पास नहीं था आधार कार्ड
मृतक दोनों बच्चों का आधार कार्ड नहीं बना था. आधार कार्ड नहीं होने के कारण उनका स्कूल में नामांकन भी नहीं हो सका. इस वजह से दोनों बच्चे स्कूली शिक्षा से भी वंचित रहे. यह स्थिति गरीब परिवारों तक सरकारी योजनाओं और शिक्षा की पहुंच पर गंभीर सवाल खड़े करती है.
