गढ़वा: सूबे की सरकार एक तरफ दावा करती है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे बच्चों को न केवल गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दी जाएगी, बल्कि उनके शारीरिक विकास के लिए पौष्टिक और शुद्ध मध्याह्न भोजन (एमडीएम) भी मिलेगा. लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों के बिल्कुल उलट है. गढ़वा जिले में हाल के दिनों में चलाए गए प्रशासनिक जांच अभियानों ने जो कड़वी सच्चाई उजागर की है, उसने साफ कर दिया है कि ‘मिलावट और लापरवाही की आंच अब स्कूलों की रसोइयों तक पहुंच चुकी है. चिंताजनक बात यह है कि कुछ ही दिनों पहले खरौंधी प्रखंड के कस्तूरबा गांधी बालिका आवासीय विद्यालय में जहरीला खाना (फूड पॉइजनिंग) खाने से 100 से अधिक छात्राएं एक साथ बीमार पड़ी थीं, जिसके बाद गूंजे प्रशासनिक बवंडर में वार्डन समेत कई शिक्षकों पर गाज गिरी थी. लेकिन इस बड़े हादसे के बावजूद न तो व्यवस्था सुधरी है और न ही जिम्मेदारों के मन में मासूमों की सेहत को लेकर कोई खौफ दिखा है.
जांच में खुली पोल: एक्सपायर्ड मसाले, टंकी का पानी और मेन्यू में धांधली
गढ़वा जिला प्रशासन द्वारा 30 जुलाई से 12 अगस्त के बीच चलाए गए सघन जांच अभियानों की रिपोर्ट किसी के भी रोंगटे खड़े करने के लिए काफी है. उत्क्रमित मध्य विद्यालय, रमना:- रसोइघर में ‘मॉडर्न’ कंपनी का एक्सपायर्ड (समय सीमा समाप्त) सब्जी मसाला जब्त किया गया. यानी मासूम बच्चों के पेट में सीधे तौर पर म्याद पूरी कर चुका रसायन परोसा जा रहा था. इतना ही नहीं, पीने के पानी के नाम पर केवल टंकी का अशुद्ध पानी दिया जा रहा था.नव प्राथमिक विद्यालय, सलगा पश्चिम:- ग्रामीणों की मानें तो यहाँ बच्चों को रोज सिर्फ खिचड़ी थमा दी जाती है. मेन्यू का नामोनिशान नहीं है और पीने के लिए फिल्टर का पानी छोड़ टंकी का दूषित पानी दिया जा रहा था. पीएम श्री उ.वि. ओबरा व सिलिदाग: सिलिदाग में बच्चों की थाली से भोजन की मात्रा ही गायब कर दी गई. यानी बच्चों को निर्धारित से कम भोजन दिया जा रहा था. ओबरा के किचन में ऐसा अंधेरा और गंदगी पाई गई, जहाँ खाना बनना तो दूर, खड़ा होना भी दूभर हो.
कार्रवाई की गाज, लेकिन क्या सुधरेगी नीयत?
मामलों के तूल पकड़ने और लातदाग मध्य विद्यालय में एमडीएम संचालन व शैक्षणिक अव्यवस्था की शिकायतें मिलने पर उपायुक्त पशुपति नाथ मिश्रा के निर्देश पर कार्रवाई तो हुई हैलातदाग विद्यालय के प्रभारी प्रधानाध्यापक अमरेंद्र कुमार सिन्हा के खिलाफ प्रपत्र 'क' गठित कर विभागीय कार्रवाई शुरू की गई.दो सहायक अध्यापकों (संजय कुमार द्विवेदी, प्रियंका द्विवेदी) और एक संकुल साधन सेवी (मंजू कुमारी) का एक वार्षिक वेतन/मानदेय रोक दिया गया. विभिन्न स्कूलों की संयोजिकाओं को कड़ी चेतावनी दी गई है.
सुलगता सवाल : क्या कागजी हिदायत से बचेगी बच्चों की जान?
यह कोई पहला मौका नहीं है जब किसी जांच टीम ने स्कूलों में छापा मारा हो और खामियां पाई हों. सवाल यह उठता है कि एक्सपायरी मसाले पहुंचे कैसे? जब सरकारी फंड से राशन की खरीदारी होती है, तो दुकानों या संयोजिकाओं द्वारा एक्सपायर्ड सामान खरीदकर बच्चों की थाली तक पहुंचाना आपराधिक लापरवाही नहीं तो और क्या है?नल से जल के युग में टंकी का अशुद्ध पानी क्यों? जल जीवन मिशन और 'झार जल' की तमाम घोषणाओं के बावजूद अगर गढ़वा के बच्चे स्कूल में टंकी का बदबूदार या दूषित पानी पीने को मजबूर हैं, तो इसका जिम्मेदार कौन है?खरौंधी कांड से भी सबक क्यों नहीं? 100 से ज्यादा बच्चियों के अस्पताल पहुंचने की घटना के बाद भी अगर जिम्मेदार नहीं चेत रहे हैं, तो क्या जिला प्रशासन को किसी बड़े हादसे का इंतजार है?
केवल एक-दो शिक्षकों का वेतन काटना समस्या का स्थायी समाधान नहीं है
केवल एक-दो शिक्षकों का वेतन काटना या संयोजिका को चेतावनी देना इस गंभीर समस्या का स्थायी समाधान नहीं है. जब तक खाद्य सामग्री आपूर्ति करने वाले वेंडरों, खरीद प्रक्रिया से जुड़े बिचौलियों और लापरवाही बरतने वाले स्कूल प्रबंधनों पर फूड सेफ्टी एक्ट के तहत आपराधिक मुकदमे दर्ज नहीं होंगे, तब तक गढ़वा के मासूमों की थाली में शुद्धता और सुरक्षा लौट पाना नामुमकिन है.
