गढ़वा को 1981 में मिला था अपना नगरपालिका कार्यालय

गढ़वा को 1981 में मिला था अपना नगरपालिका कार्यालय

पीयूष तिवारी, गढ़वा गढ़वा नगर परिषद का भव्य कार्यालय इन दिनों रामबांध तालाब के पास करोड़ों रुपये की लागत से बनाया जा रहा है. आधुनिक सुविधाओं से लैस यह भवन शहर की पहचान बनेगा. नगर परिषद के अभिलेखों के अनुसार, गढ़वा को वर्ष 1957 में अधिसूचित क्षेत्र घोषित किया गया था. इसके बाद वर्ष 1972 में इसे नगरपालिका का दर्जा मिला. मार्च 1981 तक नगर परिषद का कार्यालय शहर के प्रसिद्ध गढ़देवी मंदिर के पास बीचला गढ़ स्थित एक किराये के कमरे में चलता रहा. इसके लिए बीचला गढ़ के दावेदारों को प्रतिमाह 40 रुपये किराया दिया जाता था. बताया जाता है कि उस समय नगर पालिका के पास पर्याप्त धनराशि नहीं थी, जिस कारण कार्यालय भवन का निर्माण नहीं हो सका था. वित्तीय वर्ष 1980 से 1985 तक नगर परिषद की वार्षिक आय मात्र 21 हजार रुपये थी. इसी राशि से 42-43 कर्मचारियों का वेतन और अन्य आवश्यक विकास कार्यों का खर्च वहन किया जाता था. आर्थिक तंगी के कारण वर्ष 1981 तक स्थायी कार्यालय भवन का निर्माण संभव नहीं हो सका. आखिरकार वर्ष 1981 में लगभग 10 हजार रुपये की व्यवस्था कर सहिजना रोड में एक कमरे का कार्यालय भवन बनाया गया. बाद में समय के साथ इसमें दो और कमरे जोड़े गये. वर्तमान में नगर परिषद का कार्यालय पुराने समाहरणालय भवन से संचालित किया जा रहा है. …………. 1963 में बना गढ़वा टाउन रेलवे स्टेशन – लोहरदगा से रेणुकूट तक खनिज परिवहन की जरूरत ने बदली क्षेत्र की तस्वीर गढ़वा शहर के अधिसूचित होने के पांच वर्ष बाद, एक जनवरी 1963 को गढ़वा टाउन रेलवे स्टेशन का निर्माण कराया गया. इसका उद्घाटन तत्कालीन रेलमंत्री जगजीवन राम ने किया था. इसके बाद से गढ़वा रोड-चोपन रेलखंड पर रेल आवागमन नियमित रूप से जारी है. गढ़वा टाउन रेलवे स्टेशन के निर्माण से जुड़ा एक दिलचस्प पहलू भी है. अंग्रेजों के शासनकाल में गढ़वा के बजाय लातेहार जिले के बरवाडीह से चिरमिरी, जो अंबिकापुर के पास छत्तीसगढ़ में स्थित है, तक रेलवे लाइन बिछाने की योजना स्वीकृत की गयी थी. यह प्रस्तावित रेलमार्ग गढ़वा से लगभग 65 किलोमीटर दूर भंडरिया और बड़गड़ होते हुए गुजरने वाला था. द्वितीय विश्व युद्ध से पहले इस मार्ग पर मिट्टी भरायी कर ट्रैक तैयार किया गया था और कुछ स्थानों पर स्टाफ क्वार्टर और प्लेटफॉर्म भी बनाये गये थे, लेकिन युद्ध शुरू होने के बाद यह कार्य अधूरा रह गया, जो आज तक पूरा नहीं हो सका. स्वतंत्रता के बाद भी इस रेलमार्ग पर पटरी बिछाने के प्रयास हुए, लेकिन इसी दौरान उत्तर प्रदेश के रेणुकूट में हिंदालको इंडस्ट्रीज लिमिटेड की फैक्ट्री स्थापित हो गयी. लोहरदगा से बॉक्साइट अयस्क को रेणुकूट तक पहुंचाने के लिए नये रेलमार्ग की आवश्यकता महसूस की गयी. इसके बाद गढ़वा रोड से चोपन तक, गढ़वा टाउन स्टेशन होते हुए रेलमार्ग का निर्माण किया गया.

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Published by: Akarsh aniket

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