गढ़वा में शिक्षा व्यवस्था की खुली पोल: 40 स्कूलों के दायरे में 2,768 बच्चे स्कूल से बाहर; आंकड़े देख हैरान हुआ प्रशासन

झारखंड के गढ़वा जिले में 2768 बच्चे स्कूल से बाहर पाए गए हैं. प्रशासन ने इन बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा में लाने के लिए विशेष रेस्क्यू अभियान शुरू किया है.

गढ़वा: डिजिटल इंडिया और सर्व शिक्षा अभियान के बड़े-बड़े विज्ञापनों के बीच गढ़वा जिले से जो जमीनी तस्वीर निकलकर सामने आ रही है, वह किसी को भी चौंकाने के लिए काफी है. जिले के अकेले रमकंडा प्रखंड के 40 स्कूलों के दायरे में 2,768 बच्चे स्कूल से बाहर (आउट ऑफ स्कूल) पाए गए हैं. यानी मासूमों की एक पूरी जमात कागजी दावों से इतर किताबों से दूर, खेतों, ढाबों या मजदूरी की भट्टी में झोंकी जा रही है.यू-डायस डैशबोर्ड पर जब यह आंकड़ा दर्ज हुआ, तो राज्य मुख्यालय से लेकर जिला प्रशासन के गलियारों तक हड़कंप मच गया. इसके बाद आनन-फानन में समाहरणालय में बैठकों का दौर शुरू हुआ और छूटे हुए बच्चों को जबरन या समझाकर स्कूल की देहरी तक लाने के लिए प्रशासनिक रेस्क्यू अभियान का खाका तैयार किया गया.

सिर्फ 706 का नामांकन, शेष 2000+ बच्चे अब भी कागज़ों में 'लापता'

झारखंड शिक्षा परियोजना परिषद, रांची के सीधे हस्तक्षेप के बाद जिला प्रशासन हरकत में आया है. उपायुक्त पशुपति नाथ मिश्रा की अध्यक्षता में हुई समीक्षा में जब आंकड़ों का पोस्टमार्टम किया गया, तो हकीकत सामने आई कुल चिन्हित आउट ऑफ स्कूल बच्चे:- 2,768 (केवल रमकंडा प्रखंड के 40 चयनित स्कूलों में) अब तक दर्ज नामांकन:- 706 बच्चे (विशेष प्रयास से अन्य स्कूलों में दाखिला कराया गया) अब भी शिक्षा से दूर: 2,062 बच्चे (जिन्हें मुख्यधारा में लाना बड़ी चुनौती बना हुआ है)

सुलगता सवाल

लेकिन सवाल अब भी यही है कि जब एक अकेले प्रखंड के केवल 40 स्कूलों में 2700 से ज्यादा बच्चे ड्रॉपआउट या अनामांकित हैं, तो जिले के बाकी 19 प्रखंडों और सैकड़ों गांवों का क्या हाल होगा? पड़ताल बताती है कि रमकंडा जैसे सुदूर और गरीब प्रभावित या पहाड़ी इलाकों में बच्चों के स्कूल से बाहर होने की वजहें सिर्फ गरीबी नहीं है. रमकंडा और आसपास के इलाकों से हर साल दर्जनों परिवार ईंट-भट्ठों और दूसरे राज्यों में मजदूरी के लिए पलायन करते हैं. उनके साथ बच्चे भी स्कूल छोड़कर चले जाते हैं. कई टोले-मोहल्लों से स्कूलों की दूरी और बीच में पड़ने वाले नाले-जंगल छोटे बच्चों के नियमित स्कूल जाने में बड़ी बाधा हैं.स्कूलों में गुणवत्ताहीन भोजन और बुनियादी सुविधाओं (पीने के पानी, शौचालय) का अभाव भी बच्चों का मन पढ़ाई से उचाट कर देता है.

प्रशासनिक 'अल्टीमेटम' डोर-टू-डोर दस्तक की तैयारी

मामले की गंभीरता को देखते हुए उपायुक्त ने शिक्षा विभाग, जेएसएलपीएस और पुलिस प्रशासन को साझा एक्शन प्लान पर काम करने का निर्देश दिया है जेएसएलपीएस के महिला स्वयंसहायता समूहों के जरिए गांव-गांव में उन परिवारों को चिन्हित किया जाएगा, जिनके बच्चे स्कूल नहीं जा रहे हैं. बीडीओ, थाना प्रभारी और संकल साधन सेवियों को निर्देश दिया गया है कि वे संयुक्त रूप से अभियान चलाकर शेष 2000 से अधिक बच्चों का नामांकन सुनिश्चित कराएं. इस मामले में जानकारों का कहना हैं कि कागजों पर लक्ष्य तय करना और समीक्षा बैठकें आयोजित करना आसान है, लेकिन जब तक पलायन रोकने, ड्रॉपआउट के कारणों को खत्म करने और स्कूलों के अंदर भोजन व पढ़ाई का बेहतर माहौल बनाने पर ठोस काम नहीं होगा, तब तक हर साल हजारों 'आउट ऑफ स्कूल' बच्चे सरकारी तंत्र की नाकामी की कहानी बयां करते रहेंगे.


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By Avinash singh

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