करोड़ों का कोल्ड स्टोर, पर फायदा 'जीरो' : झारखंड के घाटशिला में 5 साल से धूल फांक रही 2.43 करोड़ की मशीनें

East Singhbhum Farmers: पूर्वी सिंहभूम के घाटशिला में करोड़ों की लागत से बना कोल्ड स्टोरेज पिछले पांच वर्षों से शो-पीस बना हुआ है. श्यामा प्रसाद मुखर्जी रुर्बन मिशन के तहत 2.43 करोड़ रुपये की लागत से निर्मित इस भवन का उद्घाटन आज तक नहीं हो सका. पढ़ें जानें इसकी क्या वजह है और किसानों को इससे क्या नुकसान हो रहा है.

East Singhbhum Farmers, पूर्वी सिंहभूम : झारखंड सरकार किसानों की आय दोगुनी करने और उनकी उपज को सुरक्षित रखने के बड़े-बड़े दावे करती हैं, लेकिन धरातल पर हकीकत कुछ और ही है. पूर्वी सिंहभूम जिले के घाटशिला प्रखंड की काशिदा पंचायत में करीब 2 करोड़ 43 लाख रुपये की भारी-भरकम लागत से बना कोल्ड स्टोर पिछले पांच वर्षों से सफेद हाथी साबित हो रहा है. आलम यह है कि उद्घाटन की बाट जोहता यह भवन अब देख-रेख के अभाव में बर्बाद होने लगा है.

रुर्बन मिशन के तहत हुआ था निर्माण

श्यामा प्रसाद मुखर्जी रुर्बन मिशन के तहत जिला परिषद द्वारा इस कोल्ड स्टोर का निर्माण कराया गया था. 7 जुलाई 2021 को इसका शिलान्यास तत्कालीन सांसद विद्युत वरण महतो, विधायक रामदास सोरेन, जिप अध्यक्ष बुलू रानी सिंह और अन्य जनप्रतिनिधियों की उपस्थिति में धूमधाम से किया गया था. हरिओम कंस्ट्रक्शन ने लगभग 4800 वर्ग फीट में फैले इस आधुनिक कोल्ड स्टोर का काम समय पर पूरा कर विभाग को सौंप भी दिया, लेकिन विडंबना यह है कि यहां आज तक एक बोरी आलू भी नहीं रखा जा सका.

किसानों को नहीं मिल रहा लाभ

इस कोल्ड स्टोर का मुख्य उद्देश्य क्षेत्र के किसानों को बिचौलियों से बचाना और उनकी उपज जैसे आलू, प्याज, टमाटर व अन्य सब्जियों को सुरक्षित रखने की सुविधा देना था. भंडारण की व्यवस्था न होने के कारण किसान आज भी अपनी फसल ओने-पौने दामों में बेचने को विवश हैं. पिछले पांच सालों में कई अधिकारियों ने इसका निरीक्षण किया, फाइलें दौड़ीं, लेकिन नतीजा ”सिफर” रहा.

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दो बार टेंडर फेल, तीसरी बार की तैयारी

कोल्ड स्टोर के बंद रहने का मुख्य कारण इसका संचालन करने वाली एजेंसी का न मिलना है. जमशेदपुर जिला परिषद कार्यालय के सहायक अभियंता प्रताप महंथी ने बताया कि कोल्ड स्टोर के संचालन के लिए अब तक दो बार निविदा (टेंडर) निकाली जा चुकी है. नियम के अनुसार, संचालक को प्रति वर्ष 12 लाख रुपये विभाग को देने होंगे, लेकिन इस शर्त पर अब तक कोई भी संवेदक आगे नहीं आया है. अब विभाग तीसरी बार टेंडर निकालने की प्रक्रिया कर रहा है. उम्मीद है कि जल्द ही संचालक मिलने पर इसे चालू कर दिया जाएगा.

बिना उपयोग के जर्जर हो रही मशीनें

ग्रामीणों का कहना है कि करोड़ों की मशीनें और बिजली के उपकरण बिना इस्तेमाल के खराब हो रहे हैं. अगर जल्द ही इसे शुरू नहीं किया गया, तो सरकार का यह पैसा पूरी तरह पानी में बह जाएगा. किसान इस उम्मीद में हैं कि अगली फसल आने से पहले प्रशासन कोई ठोस रास्ता निकालेगा.

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Published by: Sameer Oraon

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