पूर्वी सिंहभूम: चाकुलिया के जंगल के काजू और साल के बीज बने ग्रामीणों की कमाई का जरिया

East Singhbhum News:  झारखंड में जंगलों में पाए जाने वाले कंद-मूल ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाते हैं. झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिला स्थित चाकुलिया प्रखंड भी इससे अछूता नहीं है. यहां ग्रामीण क्षेत्र के लोग आज भी रोजगार के लिए जंगलों पर आश्रित हैं. हाल के दिनों में साल और काजू के बीज इन ग्रामीणों की अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रहे हैं.

चाकुलिया से राकेश सिंह की रिपोर्ट

East Singhbhum News: चाकुलिया प्रखंड क्षेत्र में लगभग 3000 हेक्टेयर जमीन पर काजू के पौधे लगे हैं. वहीं 10 हजार हेक्टेयर से अधिक भूमि पर साल के जंगल पाए जाते हैं. इन जंगलों से मिलने वाले साल के बीज और काजू क्षेत्र के लोगों को आर्थिक रूप से मजबूत बनाते हैं. हालांकि वन विभाग द्वारा नीति निर्धारण नहीं होने से ग्रामीणों को कम मुनाफा होता है जबकि इस व्यवसाय से जुड़े हुए लोग ग्रामीणों से औने-पौने दाम पर खरीद कर अच्छा मुनाफा कमाते हैं.

10 से 15 हजार रुपये का होता है मुनाफा

चाकुलिया के जंगलों में साल के पेड़ फूलों से लदे हैं. मई और जून के महीने में साल के फूल हवा के झोंकों के साथ टूट कर नीचे गिरते हैं. फूलों के निचले हिस्से में फल होती है. ग्रामीण इन फूलों को इकट्ठा कर धूप में सुखाते हैं. फिर आग जलाकर फूलों की पंखुड़ियां को हटाते हैं. इसके नीचे मिलता है साल का बीज, जिसे साल का फल भी कहा जाता है. प्रखंड क्षेत्र के बर्डीकानपुर-कालापाथर, सोनाहातू, भातकुंडा, जमुआ, बड़ामारा, बिरदोह, चंदनपुर,  कालियाम, बेंद, श्यामसुंदरपुर, मटियाबांधी में भरपूर मात्रा में साल के पेड़ पाए जाते हैं. इन साल के जंगलों से ग्रामीण खूब साल के फूल और बीज इकट्ठा करते हैं. उन्हें धूप में सुखाकर बीज निकाला जाता है और इस बीज को 25 से 30 रुपए की दर पर बाजार में बेच देते हैं. सिर्फ एक महीने के मेहनत से एक-एक परिवार को साल के बीजों को बेचकर 10 से 15 हजार रुपये का मुनाफा होता है. 

₹25 प्रति किलो बिकते हैं साल बीज

ग्रामीण महिला फुलमनी हेंब्रम, छीता टुडू, दीपाली महतो, रजनी पातर आदि ने बताया कि जंगलों से वे साल के बीच चुनकर लाते हैं. इन्हें धूप में सुखाकर, जलाकर, तोड़कर तब साल के बीज मिलते हैं. बताया कि उनके घर तक पहुंचने वाले व्यवसायी ₹25 में साल बीज की खरीदारी करते हैं जबकि चाकुलिया अथवा धालभूमगढ़ बाजार जाकर बेचने पर उन्हे प्रति किलो ₹30 प्राप्त होते हैं.

बीज निकालने के लिए साल के फूलों को सुखाकर जलाते ग्रामीण

वन विभाग ने किया खरीदना बंद

वर्ष 1990 के पहले तक साल के बीजों की खरीदारी के लिए विभाग द्वारा निगम बनाया गया था. ग्रामीण साल बीज चुन कर वन विभाग द्वारा बनाए गए निगम को बेच देते थे. वन विभाग इन साल बीजों को दूसरे प्रदेशों में बेचकर अच्छा मुनाफा कमाती थी. लेकिन वर्ष 1995-96 के बाद से अब खुले बाजारों में इसकी बिक्री की जाती है.

प्रोसेसिंग प्लांट खुलते तो रोजगार के अवसर बढ़ते 

झारखंड में साल के पेड़ भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं. यहां से साल के बीच भी भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं. अगर झारखंड सरकार द्वारा नीति निर्धारण कर अलग-अलग प्रखंडों में अथवा जिलों में प्रोसेसिंग की व्यवस्था कर दी जाती तो वन उपज का सीधा लाभ ग्रामीणों को मिलता. प्रोसेसिंग प्लांट खुलने से रोजगार का भी सृजन होता.

50 हजार क्विंटल काजू का होता है उत्पादन

चाकुलिया वन क्षेत्र में 3000 हेक्टेयर भूमि पर काजू के जंगल है. इनमें से 2000 हेक्टेयर वन भूमि, जबकि 1000 हेक्टेयर रैयतों की भूमि है. जिनमें लगभग 50 हजार क्विंटल काजू का उत्पादन होता है. चाकुलिया के जंगलों से उत्पादित काजू की कीमत लगभग 25 करोड़ रुपये बताई जाती है. ग्रामीण अपने-अपने क्षेत्र के जंगलों से काजू तोड़कर चोरी छिपे मुनाफाखोरों को बेच देते है. प्रतिवर्ष अप्रैल और मई के महीने में ग्रामीण क्षेत्र के महिला और पुरुष काजू बेचकर हजारों रुपए के मुनाफा कमाते हैं. बड़ा प्रोसेसिंग यूनिट होता तो ग्रामीणों का यह मुनाफा हजारों नहीं बल्कि लाखों रूपयों में होता. वन विभाग को भी लाभ होता और रोजगार सृजन अलग से होता. 

चाकुलिया के जंगलों में पौधों पर लदे काजू

बंगाल के बाजार की स्वाद बढ़ा रहे हैं चाकुलिया के काजू

वन विभाग की ओर से चाकुलिया, बहरागोड़ा और मानुषमुडिया में तीन काजू प्रोसेसिंग प्लांट लगाए गए थे. लघु काजू प्रोसेसिंग प्लांट से काजू निकालने में खर्च अधिक और बिजली की अधिक खपत से प्लांट बंद हो गए हैं. वन विभाग की ओर से नीति निर्धारण नहीं होने के कारण यहां उत्पादित काजू की पश्चिम बंगाल में 100 से 120 रुपये प्रति किलो की दर से कालाबाजारी कर दी जाती है. जिसे प्रोसेसिंग कर पश्चिम बंगाल के व्यवसायी 700 से 1000 रुपये प्रति किलोग्राम बेचते है.

वर्ष 2006-07 तक वन विभाग करता था काजू का टेंडर

वर्ष 2006-07 तक काजू का टेंडर होता था. पहले चाईबासा उसके बाद जमशेदपुर वन प्रमंडल में टेंडर की प्रक्रिया पूरी की जाती थी. जिससे वन विभाग को 5 से 8 लाख रुपए तक की वार्षिक कमाई होती थी. चाकुलिया स्थित मातापुर निवासी भारत पात्र ने बताया कि कई बार उन्होंने काजू का टेंडर लिया. इसके लिए उन्हें जमशेदपुर वन प्रमंडल कार्यालय जाना पड़ता था. टेंडर लेने के बाद लगभग एक से डेढ़ महीने तक उनकी टीम काजू के जंगलों की पहरेदारी करती थी. फिर काजू इकट्ठा कर उसकी बिक्री की जाती थी. अब विभाग द्वारा टेंडर बंद कर दिया गया. 

वनोपज को लेकर विभाग द्वारा कोई स्पष्ट निर्देश नहीं: रेंजर

इस संबंध में पूछे जाने पर रेंजर दिग्विजय सिंह ने कहा कि वनोपज से संबंधित किसी भी तरह का नीति निर्धारण विभाग द्वारा किया जाता है. साल बीज और काजू को लेकर विभाग की ओर से उन्हें कोई विशेष निर्देश प्राप्त नहीं हुआ है. काजू प्रोसेसिंग प्लांट बनाने को लेकर चर्चा चल रही है.

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Published by: Sweta Vaidya

श्वेता वैद्य प्रभात खबर डिजिटल में कंटेंट राइटर के तौर पर काम करती हैं. कंटेंट राइटिंग के क्षेत्र में एक साल से अधिक का अनुभव है. पिछले करीब दो महीनों से वे झारखंड बीट पर सक्रिय रूप से काम कर रही हैं. इस दौरान वे राज्य से जुड़ी ताजा खबरों, लोगों से जुड़े मुद्दे और जरूरी जानकारियों पर आधारित स्टोरीज तैयार कर रही हैं. इससे पहले उन्होंने लाइफस्टाइल बीट के लिए भी कंटेंट लिखा. इस बीट में उन्होंने रेसिपी, फैशन, ब्यूटी टिप्स, होम डेकोर, किचन टिप्स, गार्डनिंग टिप्स और लेटेस्ट मेहंदी डिजाइन्स जैसे रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े विषयों पर रोचक और उपयोगी आर्टिकल लिखे. श्वेता की हर बार कोशिश यही रहती है कि बात आसान, साफ और सीधे तरीके से लोगों तक पहुंचे, जिससे कि हर कोई उसे बिना दिक्कत के समझ सके. कंटेंट राइटर के तौर पर उनका फोकस होता है कि कंटेंट सिंपल, रिलेटेबल और यूजर-फ्रेंडली हो.

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