जैविक खेती से लंबे समय तक बनी रहती है मिट्टी की उर्वरता

मचला व रघुवाडीह गांव में जैविक खेती को लेकर कार्यशाला का आयोजन किया गया. बताया गया कि जैविक खेती, पर्यावरण प्रदूषण को रोकने में मदद करती है क्योंकि इसमें कीटनाशकों का इस्तेमाल कम होता है.

बासुकिनाथ. ऑर्गेनिक फार्मिंग अथॉरिटी ऑफ झारखंड के बैनर तले कृषि विकास योजना के तहत इको गारंटी, रांची द्वारा जरमुंडी प्रखंड के मचला व रघुवाडीह गांव में किसानों को जैविक खेती करने हेतु कार्यशाला का आयोजन किया गया. कृषि वैज्ञानिक ने बताया कि जैविक खेती, पर्यावरण प्रदूषण को रोकने में मदद करती है क्योंकि इसमें कीटनाशकों का इस्तेमाल कम होता है. इससे मिट्टी की गुणवत्ता बेहतर होती है और कार्बन उत्सर्जन कम होता है. जैविक खेती से मिट्टी की उर्वरता लंबे समय तक बनी रहती है. जैविक खेती से जल और वायु प्रदूषण से भी बचा जा सकता है. जैविक खेती के लिए किसानों को प्राचीन कृषि पद्धतियों को अपनाने की सलाह दी. किसानों को खेती में रसायनों का इस्तेमाल कम करने की बात कही गयी. कहा कि रासायनिक खाद के प्रयोग से खेत की उर्वरा शक्ति क्षीण होती है. मुख्य प्रशिक्षक ने बताया कि शुद्ध जैविक खेती में सिंथेटिक उर्वरकों, जीएमओ और कीटनाशकों का इस्तेमाल नहीं किया जाता. इसकी बजाय, प्राकृतिक स्रोतों से उर्वरक और कीटनाशक लिए जाते हैं. जैविक कीटनाशक का प्रयोग करने की बात कही गयी. बताया कि कीटों और रोगों से फसलों को बचाने के लिए इस्तेमाल होने वाले प्राकृतिक पदार्थों के उत्पाद होते हैं. इन्हें बायो-पेस्टीसाइड भी कहा जाता है. ये पर्यावरण के लिए सुरक्षित होते हैं और इनसे स्वास्थ्य को कोई नुकसान नहीं होता. कार्यशाला में किसानों को नीम अर्क, जीवामृत, मटका खाद, केंचुआ खाद सहित कई प्राकृतिक कीटनाशक एवं अन्य दवा बनाने की विधि को विस्तारपूर्वक बताया गया. इस मौके पर क्षेत्रीय पदाधिकारी प्रमोद कुमार, मनोज यादव, श्रीकांत यादव, त्रिभुवन यादव, मुकेश यादव, धनेश्वर महतो, हेमावती देवी, चंपा देवी, बेबी यादव, प्रियंका कुमारी, झमली देवी, युधिष्ठिर राउत सहित 320 किसान मौजूद थे.

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Published by: Anand jaswal

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