प्रतिनिधि, रानीश्वर. वर्षा ऋतु अब ढलान पर है और सितंबर के आगमन के साथ ही रानीश्वर प्रखंड क्षेत्र में प्रकृति ने शरद ऋतु के स्वागत की तैयारी शुरू कर दी है. नदी के किनारों, खेतों की मेड़ों, जंगलों और मुख्य सड़कों के आसपास खिले सफेद काश के फूल पूरे इलाके को मनमोहक रूप दे रहे हैं. दूर तक फैली काश के फूलों की सफेद चादर ग्रामीण क्षेत्रों की प्राकृतिक सुंदरता में चार चांद लगा रही है.
काश के फूलों से मिलती है शरद ऋतु की पहचान
शरद ऋतु के प्रारंभ में खिलने वाला काश एक प्रकार का जंगली घास है, जिसके सफेद फूल ग्रामीण इलाकों में प्रकृति की खूबसूरती को और निखार देते हैं. धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी काश के फूलों का विशेष महत्व माना जाता है. इनके खिलने को शारदीय नवरात्र और दुर्गा पूजा के आगमन का पारंपरिक संकेत माना जाता है.
काश फूल का वानस्पतिक नाम सैकरम स्पोंटेनियम (Saccharum spontaneum) है. बारिश का मौसम समाप्त होने के बाद शरद ऋतु की शुरुआत के साथ ही इसके फूल खिलने लगते हैं. यही वजह है कि काश के फूलों को देखकर लोगों को दुर्गोत्सव के करीब आने का अहसास होने लगता है.
महालया को लेकर बढ़ा उत्साह
इस बार 10 अक्टूबर को महालया है. काश के फूलों के खिलने के साथ ही क्षेत्र में दुर्गा पूजा को लेकर उत्साह और चहल-पहल भी बढ़ने लगी है. ग्रामीण इलाकों में पूजा कमेटियों ने तैयारियां तेज कर दी हैं.
पंडाल और प्रतिमाओं को अंतिम रूप देने में जुटे कारीगर
दुर्गा पूजा को लेकर विभिन्न पूजा समितियों की ओर से पंडाल निर्माण और विद्युत सज्जा की तैयारियां शुरू कर दी गई हैं. वहीं, मूर्तिकार मां दुर्गा समेत अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को अंतिम रूप देने में जुटे हैं.
प्रकृति में आए इस मनोहारी बदलाव और चारों ओर खिले काश के फूलों ने श्रद्धालुओं के बीच भी दुर्गोत्सव का उल्लास बढ़ा दिया है. ग्रामीण क्षेत्रों में इन दिनों जहां नजर जाती है, वहां काश के फूलों की सफेदी शारदीय मौसम और आने वाले त्योहार की दस्तक देती नजर आ रही है.
