आजादी के 79 साल बाद भी सड़क से महरूम छोटा गुलामशुली
दुमका : सरकार भले ही सुदूर ग्रामीण इलाकों तक पक्की सड़कों का जाल बिछाने और अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुंचाने के दावे करे, लेकिन उपराजधानी दुमका के ग्रामीण क्षेत्रों में जमीनी हकीकत अलग है. रानीश्वर प्रखंड के गुलामशुली गांव अंतर्गत छोटा गुलामशुली टोला आज भी एक अदद पक्की सड़क के लिए तरस रहा है. बुनियादी सुविधाओं के अभाव में ग्रामीण परेशान हैं. इसी बदहाली और प्रशासनिक अनदेखी के खिलाफ टोले के ग्रामीणों ने पारंपरिक 'कुल्ही दुरुप' ग्राम बैठक आयोजित कर अपनी आवाज उठाई. ग्रामीणों ने कहा कि वर्षों से उन्हें केवल आश्वासन मिले हैं, अब वे धरातल पर पक्की सड़क का निर्माण चाहते हैं.
20 साल पहले बिछे थे बोल्डर
गुलामशुली में कुल 110 आदिवासी परिवार रहते हैं और गांव मुख्य रूप से दो टोलों में विभाजित है. बड़ा गुलामशुली में 53 घर हैं, जबकि छोटा गुलामशुली में 57 परिवार निवास करते हैं. दोनों टोलों के बीच करीब डेढ़ से दो किलोमीटर का फासला है.
ग्रामीणों के अनुसार, लगभग 20 वर्ष पूर्व सड़क के नाम पर सिर्फ एक पुलिया बनाकर नुकीले बोल्डर बिछाए गए थे. इसके बाद किसी जनप्रतिनिधि या विभागीय अधिकारी ने इस रास्ते की सुध नहीं ली. देखरेख के अभाव में बोल्डर उखड़ चुके हैं और नुकीले पत्थरों के कारण इस मार्ग पर पैदल चलना या साइकिल चलाना भी मुश्किल है.
एंबुलेंस तक नहीं पहुंचती
सड़क नहीं होने का सबसे गंभीर असर बीमार लोगों, बुजुर्गों और प्रसव पीड़ा से जूझती महिलाओं पर पड़ता है. उबड़-खाबड़ और पथरीले रास्ते के कारण गांव में चारपहिया वाहन, टोटो या एंबुलेंस का पहुंचना मुश्किल है. गंभीर रूप से बीमार होने पर परिजनों को मरीज को खाट पर लिटाकर डेढ़ से दो किलोमीटर का रास्ता पैदल तय करना पड़ता है. बड़ा गुलामशुली पहुंचने के बाद ही किसी वाहन का सहारा मिलता है.
ग्रामीणों ने बताया कि रास्ते की बदहाली के कारण आपातकालीन स्थिति में डॉक्टर या स्वास्थ्यकर्मी भी गांव आने से कतराते हैं, जिससे मरीजों को परेशानी होती है.
बच्चों की पढ़ाई भी होती है प्रभावित
बरसात के मौसम में कीचड़ और जलजमाव के कारण स्कूली बच्चों को भारी कठिनाई होती है. कई बार बच्चे स्कूल जाने से वंचित रह जाते हैं. सड़क की बदहाली का असर ग्रामीणों के हाट-बाजार जाने पर भी पड़ता है. ग्रामीणों और किसानों को अपनी उपज बाजार ले जाने या रोजमर्रा की जरूरत का सामान लाने के लिए सिर पर बोझ उठाकर पैदल चलना पड़ता है.
बरात की गाड़ियां भी रुक जाती हैं
ग्रामीणों के अनुसार, टोले में शादी-ब्याह के आयोजन के दौरान बरात की गाड़ियों को दो किलोमीटर पहले ही खड़ा करना पड़ता है. इसके बाद बरातियों को पैदल गांव पहुंचना पड़ता है. ग्रामीणों का कहना है कि इस परेशानी के कारण कई लोग टोले में रिश्ते जोड़ने से कतराते हैं.
सांसद और विधायक को सौंपा आवेदन
ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने दुमका सांसद नलिन सोरेन और शिकारीपाड़ा विधायक आलोक कुमार सोरेन को सड़क निर्माण के लिए दो-दो बार लिखित आवेदन सौंपा. जनप्रतिनिधियों ने जल्द सड़क बनवाने का भरोसा दिया, लेकिन आज तक धरातल पर कोई पहल नहीं हुई. ग्रामीणों के अनुसार किसी बड़े प्रशासनिक अधिकारी ने भी अब तक गांव का दौरा कर समस्याओं को जानने की कोशिश नहीं की.
ग्रामीणों ने मुख्यमंत्री और जिला प्रशासन से टोले का तत्काल भौतिक निरीक्षण कराकर प्राथमिकता के आधार पर पक्की सड़क का निर्माण कराने की गुहार लगाई है.
कुल्ही दुरुप में ये रहे उपस्थित
कुल्ही दुरुप में दिनेश सोरेन, गंगा टुडू, अनिल मुर्मू, लखन टुडू, धूमा मुर्मू, ठाकुर सोरेन, सोमलाल मरांडी, जसमी सोरेन, चुड़की किस्कू, सोनामुनी मरांडी, ताना सोरेन, रासमुनी किस्कू, होपना मुर्मू, टोनूय हेम्बम, सुखी हेम्बम, छोटी किसकू, बिटियां हांसदा, सजली सोरेन समेत बड़ी संख्या में ग्रामीण उपस्थित थे.
