प्रतिनिधि, दुमका. दुमका लोकसभा सीट को पहले संताल परगना लोकसभा क्षेत्र के नाम से जाना जाता था. इस ऐतिहासिक संसदीय क्षेत्र के प्रथम सांसद रहे स्व. लाल हेंब्रम ने न केवल देश की आजादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी, बल्कि आदिवासी समाज में शिक्षा की अलख जगाने और गरीबों को महाजनों के शोषण से बचाने के लिए भी उल्लेखनीय काम किया. क्षेत्र में ‘लाल बाबा’ के नाम से प्रसिद्ध लाल हेंब्रम वर्ष 1952 में संताल परगना लोकसभा क्षेत्र से सांसद चुने गये थे.
लाल हेंब्रम का जन्म 19 अप्रैल 1914 को दुमका जिले के शिकारीपाड़ा प्रखंड के सरायदहा गांव में हुआ था. इतिहास पर शोध कर रहे डॉ. संजीव कुमार मिश्र के अनुसार, लाल हेंब्रम का जीवन संघर्ष, सामाजिक जागरूकता और शिक्षा के प्रसार से जुड़ा रहा.
अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन को दिया विस्तार
डॉ. संजीव कुमार मिश्र बताते हैं कि अंग्रेजों के खिलाफ क्षेत्र में सबसे पहले स्व. भादो हेंब्रम और उनके साथी भिकू मुर्मू ने आवाज बुलंद की थी. अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर भागलपुर सेंट्रल जेल भेज दिया था. इसके बाद लाल हेंब्रम और बरियार हेंब्रम ने आंदोलन की कमान संभाली और इसे आगे बढ़ाया.
दोनों नेताओं के नेतृत्व में संताल परगना में आदिवासी समुदाय को एकजुट करने का प्रयास किया गया. उस दौर में अंग्रेजों और महाजनों की मिलीभगत से आदिवासियों के शोषण की शिकायतें आम थीं. बरमसिया और पलासी गांव में शराब की भट्ठियां चलाये जाने से भी आदिवासी समाज पर प्रतिकूल असर पड़ रहा था.
शराब और महाजनी प्रथा के खिलाफ उठायी आवाज
शराब की लत और गरीबी के कारण बड़ी संख्या में आदिवासी महाजनों के कर्ज के जाल में फंस जाते थे. इसके बाद महाजनों द्वारा उनका आर्थिक और सामाजिक शोषण किया जाता था. लाल हेंब्रम और उनके साथियों ने इन समस्याओं के खिलाफ भी आवाज उठायी और आदिवासी समाज को संगठित करने का काम किया.
1942 के आंदोलन में भी निभायी भूमिका
वर्ष 1942 में महात्मा गांधी के नेतृत्व में अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन तेज हुआ तो लाल बाबा और बरियार हेंब्रम भी इसमें शामिल हो गये. इसके बाद लाल हेंब्रम ने अपने क्षेत्र में ‘लाल सेना’ का गठन कर अंग्रेजों और महाजनों के खिलाफ संघर्ष को आगे बढ़ाया.
उनके आंदोलन से ब्रिटिश हुकूमत नाराज हो गयी थी. बताया जाता है कि अंग्रेजी शासन ने लाल बाबा को पकड़ने के लिए उनके सिर पर इनाम घोषित किया था. सिर काटकर लाने वाले को 25 हजार रुपये देने की घोषणा तक की गयी थी.
सांसद बनने के बाद भी जनहित को बनाया प्राथमिकता
वर्ष 1952 में सांसद चुने जाने के बाद भी लाल हेंब्रम का जुड़ाव अपने क्षेत्र और आम लोगों से बना रहा. उन्होंने आदिवासियों को महाजनों की ठगी और शोषण से बचाने के उद्देश्य से कुशपहाड़ी हाट की शुरुआत कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी. इसी हाट परिसर में आदिवासियों के लिए रास मेला की शुरुआत भी करायी गयी.
गरीबी और भूखमरी से लोगों को राहत दिलाने के उद्देश्य से बरमसिया में सरकारी स्तर पर ग्रेन गोला शुरू कराया गया. इससे जरूरतमंद लोगों को अनाज उपलब्ध कराने की व्यवस्था को मजबूती मिली.
अपने गांव में शिक्षा की नींव रखी
लाल हेंब्रम शिक्षा के महत्व को भी समझते थे. गरीब और अशिक्षित आदिवासी परिवारों के बच्चों को स्थानीय स्तर पर शिक्षा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से उन्होंने अपने पैतृक गांव सरायदहा में प्राथमिक से लेकर उच्च विद्यालय तक की शिक्षा की व्यवस्था शुरू कराने में पहल की.
उनका मानना था कि शिक्षा के माध्यम से ही आदिवासी समाज को सामाजिक और आर्थिक रूप से मजबूत बनाया जा सकता है. यही कारण है कि जनप्रतिनिधि बनने के बाद भी उन्होंने शिक्षा के विस्तार को अपनी प्राथमिकताओं में रखा.
नेहरू से की कॉलेज की मांग, आज भी कायम है पहचान
संताल परगना में उच्च शिक्षा की सुविधा बढ़ाने के लिए लाल हेंब्रम ने तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के समक्ष कॉलेज खोलने की मांग रखी थी. उनकी मांग पर संताल परगना में महाविद्यालय की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ, जिसे आज संताल परगना महाविद्यालय, दुमका के नाम से जाना जाता है.
इस तरह लाल हेंब्रम का योगदान केवल स्वतंत्रता आंदोलन तक सीमित नहीं रहा. उन्होंने आदिवासी समाज को संगठित करने, महाजनी शोषण के खिलाफ आवाज उठाने, रोजगार और खाद्य सुरक्षा की दिशा में पहल करने के साथ-साथ शिक्षा के प्रसार की मजबूत नींव रखने का काम किया. यही वजह है कि संताल परगना के इतिहास में उनका नाम आज भी सम्मान के साथ लिया जाता है.
