दुमका: सावन माह में मंगलवार को काठीकुंड बाजार शिव भक्ति के रंग में रंगा नजर आया. बाबा दानीनाथ कांवरिया संघ के बैनर तले चार बसों से सैकड़ों कांवरियों का जत्था उत्तरवाहिनी गंगा से जल लेने के लिए सुल्तानगंज रवाना हुआ. पूरे बाजार में बोल बम और हर-हर महादेव के जयघोष से माहौल भक्तिमय बना रहा.
सुल्तानगंज प्रस्थान से पूर्व सभी कांवरिया काठीकुंड के सार्वजनिक दुर्गा मंदिर परिसर में एकत्र हुए. यहां से श्रद्धालु पैदल चलकर बाबा दानीनाथ मंदिर पहुंचे. मंदिर में विधिवत पूजा-अर्चना कर भगवान शिव से कांवड़ यात्रा के सकुशल एवं सफलतापूर्वक संपन्न होने की कामना की.
श्रद्धालुओं ने बाबा दानीनाथ का आशीर्वाद लेकर यात्रा की शुरुआत की. इसके बाद सभी कांवरिया सुल्तानगंज के लिए रवाना हुए. वहां उत्तरवाहिनी गंगा से पवित्र गंगाजल भरने के बाद श्रद्धालु पैदल यात्रा करते हुए बाबा बैद्यनाथ धाम पहुंचेंगे और भगवान बाबा बैद्यनाथ का जलाभिषेक करेंगे.
इसके बाद वे बाबा बासुकीनाथ धाम में भी जलार्पण करेंगे. यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं में गजब का उत्साह देखने को मिला. कांवरिये पूरे रास्ते भगवान भोलेनाथ के जयघोष और भक्ति गीतों के साथ आगे बढ़ते रहे.
बाबा दानीनाथ कांवरिया संघ के पदाधिकारियों ने बताया कि प्रत्येक वर्ष की तरह इस वर्ष भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु कांवड़ यात्रा में शामिल हुए हैं. श्रद्धालुओं की सुविधा और सुरक्षित यात्रा को लेकर आवश्यक तैयारियां की गई हैं. उन्होंने सभी श्रद्धालुओं से अनुशासन, स्वच्छता और आपसी सहयोग के साथ यात्रा पूरी करने की अपील की. चार डिब्बों वाली कांवड़ बनाती है काठीकुंड की अलग पहचान आमतौर पर कांवर यात्रा के दौरान श्रद्धालु अपनी कांवर में गंगाजल से भरे दो डिब्बे लेकर चलते हैं, लेकिन काठीकुंड के कांवरियों की अपनी एक अलग परंपरा और पहचान है. यहां के कांवरिये अपनी कांवर में गंगाजल से भरे चार डब्बे लेकर चलते हैं.
इनमें से दो डब्बों का गंगाजल बाबा बैद्यनाथ धाम और बाबा बासुकिनाथ धाम में अर्पित किया जाता है. तीसरे डिब्बे का गंगाजल काठीकुंड लौटने के बाद बाबा दानीनाथ मंदिर सहित काठीकुंड गांव के अन्य मंदिरों में जलार्पण के लिए उपयोग किया जाता है.
वहीं चौथा डब्बा सांवरिया अपने घर लेकर जाते हैं. इस गंगाजल से घर के पूजा स्थल में स्थापित विभिन्न देवी-देवताओं का जलाभिषेक किया जाता है. साथ ही शेष गंगाजल को पूरे वर्ष पूजा-पाठ, धार्मिक अनुष्ठानों एवं शुभ कार्यों के लिए सुरक्षित रखा जाता है.
यही परंपरा काठीकुंड के कांवरियों को अन्य क्षेत्रों के श्रद्धालुओं से अलग पहचान दिलाती है. इस कारण अगर कांवड़ यात्रा के दौरान कांवड़िये कभी समूह से बिछड़ जाते है, तो रास्ते में चलते चलते गंगाजल से भरे 4 डब्बों वाले कांवड़ की अनूठी पहचान के साथ कांवरिए आपस में फिर से मिल जाते है.
