काठीकुंड से अभिषेक की रिपोर्ट
Dumka Pahariya Tribe, दुमका : बदलते दौर में डिजिटल इंडिया और ग्रामीण विकास के बड़े-बड़े दावों के बीच, झारखंड की आदिम जनजाति ‘पहाड़िया समुदाय’ का जीवन आज भी बुनियादी सुविधाओं के अभाव में संघर्षपूर्ण बना हुआ है. दुमका जिले के काठीकुंड प्रखंड अंतर्गत तुर्कापहाड़ी गांव की यह जमीनी हकीकत विकास की रफ्तार पर बड़े सवाल खड़े करती है. यहां के पहाड़िया परिवारों के लिए स्वच्छ पेयजल और पक्के मकान जैसी मूलभूत जरूरतें आज भी एक बड़े सपने जैसी हैं.
सड़क के करीब तो आए, पानी के संकट ने नहीं छोड़ा पीछा
तुर्कापहाड़ी गांव में 20 से अधिक आदिम जनजाति पहाड़िया परिवार निवास करते हैं. वर्षों तक मुख्यधारा से कटे रहने और सड़क-पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाएं न मिलने के कारण, यहां के कई परिवार गांव से करीब 1 किलोमीटर दूर मुख्य ग्रामीण पथ (सड़क) के किनारे आकर बस गए थे. ग्रामीणों को उम्मीद थी कि सड़क किनारे आने से आवागमन सुलभ होगा और सरकारी योजनाएं उन तक आसानी से पहुंच सकेंगी. सड़क की सुविधा तो उन्हें किसी हद तक मिल गई, लेकिन पानी के भीषण संकट ने उनका पीछा नहीं छोड़ा. सड़क किनारे बसे 10 से अधिक परिवार आज बूंद-बूंद पानी के लिए हर दिन जद्दोजहद कर रहे हैं.
सूख चुके कुएं से रिसता गंदा पानी ही एकमात्र सहारा
ग्रामीणों के अनुसार, उनकी इस नई बस्ती में पेयजल आपूर्ति के लिए न तो कोई चापाकल (हैंडपंप) है और न ही जलमीनार या पाइपलाइन की कोई सरकारी व्यवस्था की गई है. मजबूरी में इन परिवारों को पानी के लिए वापस 1 किलोमीटर दूर स्थित एक पुराने कुएं पर निर्भर रहना पड़ता है. झुलसती गर्मी के कारण यह कुआं भी अब लगभग पूरी तरह सूख चुका है. कुएं की तली में जमा गंदला और रिसकर आने वाला दूषित पानी ही ग्रामीणों की प्यास बुझा रहा है. पानी का रिसाव इतना धीमा है कि महिलाओं को एक घड़ा पानी भरने के लिए घंटों इंतजार करना पड़ता है.
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पानी की किल्लत से आवास योजनाएं भी पड़ीं अधूरी
पेयजल संकट का सीधा असर ग्रामीणों के रहन-सहन और उनके प्रधानमंत्री या राज्य आवास योजनाओं पर भी पड़ रहा है. सड़क किनारे बसे इन परिवारों के घर आज भी अस्थायी और जर्जर स्थिति में हैं. कई घरों की छत खपरैल की है, तो कइयों ने दीवारों की जगह चारों तरफ सूखी झाड़ियां और लकड़ियां खड़ी कर किसी तरह रहने लायक झोपड़ी बनाई है. ग्रामीणों ने बताया है कि उन्हें सरकारी आवास तो स्वीकृत हुए हैं, लेकिन पानी के घोर अभाव के कारण निर्माण कार्य अधूरा पड़ा हुआ है, क्योंकि ईंट-सीमेंट की जुड़ाई के लिए पानी ही उपलब्ध नहीं हो पाता.
क्या कहते हैं भुक्तभोगी ग्रामीण?
“गांव में पानी की सबसे बड़ी समस्या है. घंटों इंतजार के बाद एक घड़ा पानी मिलता है. कई बार खाली बर्तन लेकर ही घर लौटना पड़ता है.”
-शिलावती कुमारी
“सड़क नहीं रहने से पहले मूल गांव में रहना बहुत मुश्किल था. अब सड़क के पास तो आ गए हैं, लेकिन यहाँ पानी की परेशानी और ज्यादा बढ़ गई है.”
-रासमुनी देवी
“कुएं का पानी बेहद गंदा और मटमैला है, लेकिन प्यास बुझाने के लिए मजबूरी में वही पीना पड़ता है. इससे बच्चों और बुजुर्गों की सेहत बिगड़ने का डर रहता है.”
-कन्हाई देहरी
“पानी नहीं मिलने से हमारे सरकारी आवास का काम भी पूरा नहीं हो पा रहा है. निर्माण रुकने से कई लोग इस मौसम में भी झोपड़ीनुमा घर में रहने को विवश हैं.”
-सरवा देहरी
संवेदनशील आदिम जनजाति पर कब ध्यान देगा प्रशासन?
मानवविज्ञानी और विशेषज्ञ बताते हैं कि पहाड़िया समुदाय झारखंड की सबसे पिछड़ी, संवेदनशील और विलुप्तप्राय आदिम जनजातीय आबादी में गिना जाता है. केंद्र और राज्य सरकार द्वारा विशेष रूप से इन जनजातियों के विकास, जलापूर्ति (जैसे हर घर नल का जल) और ग्रामीण आवास के लिए करोड़ों का बजट और विशेष योजनाएं संचालित की जा रही हैं. लेकिन तुर्कापहाड़ी जैसे गांवों की यह दयनीय स्थिति स्पष्ट करती है कि धरातल पर योजनाओं की मॉनिटरिंग कितनी कमजोर है. स्थानीय प्रशासन को इस आदिम बस्ती में तुरंत टैंकर से जलापूर्ति करने और स्थायी चापाकल/जलमीनार लगाने की दिशा में कदम उठाने की सख्त जरूरत है.
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