आनंद जायसवाल
Dumka: झारखंड दिवस केवल एक राजनीतिक आयोजन नहीं, बल्कि आदिवासी अस्मिता, संघर्ष और आत्मसम्मान के इतिहास की जीवंत गाथा है. आज जब दिशोम गुरु शिबू सोरेन हमारे बीच नहीं हैं, तब झारखंड दिवस की हर याद उनके अदम्य साहस और अटूट संकल्प की कहानी खुद-ब-खुद कहने लगती है. ऐसा ही एक प्रसंग है साल 1981 से जुड़ा, आज से 45 वर्ष पहले का झारखंड दिवस इस संघर्ष गाथा का सबसे सशक्त अध्याय माना जाता है. उस दौर में झारखंड अलग राज्य का आंदोलन अपने उफान पर था. दो फरवरी को झारखंड मुक्ति मोर्चा ने दुमका में झारखंड दिवस मनाने की पूरी तैयारी कर ली थी. पारंपरिक तीर-धनुष, वेश-भूषा और तमाक व डुगडुगिया की थाप पर हजारों लोग दुमका की ओर बढ़ चले थे.
एक समय छावनी में बदल गया था दुमका
लेकिन तत्कालीन बिहार सरकार ने आंदोलन की ताकत को भांपते हुए भीड़ को शहर में प्रवेश से रोकने का आदेश जारी कर दिया. उस समय के उपायुक्त यूडी चौबे के नेतृत्व में दुमका को छावनी में तब्दील कर दिया गया. गांधी मैदान में प्रस्तावित सभा तक लोगों को नहीं पहुंचने दिया गया, एसपी कॉलेज से निकलने वाली रैली पर भी पूर्ण रोक लगा दी गई. शहर के तमाम रास्ते सील कर दिए गए, जिससे जनसमूह चारों दिशाओं में बंट गया. सामान्य तौर पर ऐसी हालात में किसी भी आंदोलन के बिखर जाने की आशंका होती है, लेकिन यही वह क्षण था, जिसने गुरुजी के दृढ़ निश्चय को इतिहास में दर्ज कर दिया. सभा अव्यवस्थित जरूर हुई, पर दिशोम गुरु शिबू सोरेन रुके नहीं. उन्होंने दुमका शहर के बाहर अलग-अलग स्थानों पर जुटे लोगों तक पहुंचकर उन्हें संबोधित किया. प्रशासनिक घेराबंदी भी उनके संकल्प को नहीं रोक सकी. यह संदेश साफ था—झारखंड का आंदोलन न रोका जा सकता है, न दबाया जा सकता है.
आंदोलन की पहचान बन गई यह परंपरा
झारखंड दिवस की यह परंपरा आगे के वर्षों में आंदोलन की पहचान बन गई. हर साल दो फरवरी को दुमका के गांधी मैदान में जुटने वाली भीड़ सिर्फ एक सभा नहीं होती, बल्कि वह अपने इतिहास से संवाद करती है. कड़ाके की ठंड और सर्द रात में भी साहिबगंज, पाकुड़, देवघर, गोड्डा, जामताड़ा, दुमका समेत कई जिलों से लोग पारंपरिक हथियारों और वेश-भूषा के साथ यहां पहुंचते हैं. गुरुजी का अभिभाषण सुनना इस आयोजन का केंद्र बिंदु रहा है. इस बार न गुरूजी हैं, न गुरूजी का कोई संदेश होगा. होगा तो झारखंड को लेकर उनके संकल्प पर आगे बढ़ने का उत्साह. संघर्ष.
झारखंड संघर्ष से उपजा स्वाभिमान है
इस आयोजन पर कभी ब्रेक नहीं लगा. वैश्विक महामारी कोरोना के दौरान इस परंपरा के स्वरूप में अस्थायी बदलाव जरूर हुए थ. कार्यक्रम दिन में आयोजित किए गए, सोशल डिस्टेंसिंग के तहत कुर्सियों की व्यवस्था की गई थी और हर जिले को अपने स्तर पर झारखंड दिवस मनाने को कहा गया था, लेकिन भावना वही रही थी. झारखंड की पहचान और उसके संघर्ष की स्मृति को जीवित रखना. अब गुरूजी के बाद भी इस परंपरा को बरकरार रखने की कवायद झामुमो की है. इस वर्ष भी झारखंड दिवस की रैली परंपरा के अनुरूप एसपी कॉलेज मैदान से निकलेगी.
आयोजन को नेतृत्व प्रदान करनेवाले दुमका विधायक बसंत सोरेन मानते हैं कि झारखंड दिवस की रैली, जुलूस और हर नारा उनके उसी दृढ़ निश्चय की याद दिलाता है कि झारखंड सिर्फ एक राज्य नहीं, बल्कि संघर्ष से उपजा स्वाभिमान है.
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