बासुकिनाथ: बाबा फौजदारीनाथ की नगरी बासुकिनाथ में शुक्रवार की भोर कुशग्रहणी अमावस्या पर मिथिला की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा का अनोखा रंग देखने को मिला. सूर्योदय से पहले मिथिलावासियों ने वैदिक मंत्रोच्चारण और विधि-विधान के साथ कुश उखाड़कर पूरे वर्ष के धार्मिक कार्यों के लिए उसका संग्रह किया.
भोर की शांत बेला में मंत्रोच्चार के बीच कुश ग्रहण करने का दृश्य श्रद्धा, आस्था और सनातन परंपरा से गहराई से जुड़ा नजर आया. इस दौरान बड़ी संख्या में मिथिला समाज के लोग अपनी परंपरा के अनुसार अनुष्ठान में शामिल हुए.
क्या है कुशग्रहणी अमावस्या की परंपरा
पंडित सुधाकर झा ने बताया कि भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अमावस्या को कुशग्रहणी अथवा कुशोत्पाटिनी अमावस्या कहा जाता है. धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन विधिपूर्वक उखाड़ा गया कुश पूरे वर्ष पूजा-पाठ, यज्ञ, हवन, तर्पण, श्राद्ध और विभिन्न धार्मिक संस्कारों में इस्तेमाल किया जाता है.
सनातन धार्मिक परंपरा में कुश को पवित्र माना गया है. मान्यता के अनुसार यह केवल घास नहीं, बल्कि पवित्रता और शुद्धता का प्रतीक है.
कुश उखाड़ने के साथ होता है पितरों का आह्वान
कुश ग्रहण करने के साथ पितरों का पृथ्वी लोक में आह्वान करने की परंपरा भी जुड़ी हुई है. इसके बाद इसी कुश का उपयोग पूजा, संकल्प, आचमन, यज्ञ, हवन, तर्पण और श्राद्ध जैसे धार्मिक कार्यों में किया जाता है.
कर्मकांड के दौरान पुरोहित यजमान की अनामिका अंगुली में कुश से बनी पवित्री धारण कराते हैं. धार्मिक मान्यता है कि कुश धारण कर पितरों का श्राद्ध और तर्पण करने से पितृदेव प्रसन्न और तृप्त होते हैं.
पूर्वजों और संस्कृति से जुड़ाव का संदेश
पंडित सुधाकर झा ने कहा कि कुश सनातन परंपरा में केवल पूजा सामग्री नहीं, बल्कि पवित्रता, संयम और पूर्वजों से जुड़ाव का प्रतीक है.
उन्होंने कहा कि जिस तरह कुश की जड़ें धरती से जुड़ी रहती हैं, उसी तरह मनुष्य को भी अपनी संस्कृति और पूर्वजों के संस्कारों से जुड़े रहना चाहिए. कुशग्रहणी अमावस्या प्रकृति, देव और पितरों के प्रति कृतज्ञता का संदेश देती है.
कुश के आसन का भी है खास महत्व
बासुकिनाथ में धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान कुश के आसन का भी विशेष महत्व बताया गया. पंडित दिवाकर झा, सुधाकर झा आदि ने बताया कि धार्मिक मान्यता के अनुसार कुश के आसन पर बैठकर पूजा और साधना करने से साधक की आध्यात्मिक ऊर्जा स्थिर रहती है.
वेदों और सनातन धार्मिक परंपराओं में कुश को पवित्रता और शुद्धता का प्रतीक माना गया है. धार्मिक मान्यताओं में इसे आयुवर्धक और वातावरण को शुद्ध करने वाला भी बताया गया है.
नई पीढ़ी भी संभाल रही मिथिला की परंपरा
बाबा बासुकिनाथ की नगरी में कुशग्रहणी अमावस्या की यह परंपरा महज धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मिथिला की सांस्कृतिक पहचान का जीवंत हिस्सा है.
बदलते समय के बावजूद नई पीढ़ी भी इस परंपरा से जुड़कर धर्म, संस्कृति और पूर्वजों से जुड़े संस्कारों को आगे बढ़ाने का संकल्प ले रही है.
मौके पर पंडित कृष्णानंद झा, बम बम झा, लालदेव मिश्र, विक्की झा समेत अन्य लोग मौजूद रहे.
