मसलिया : मसलिया प्रखंड के दर्जनों गांवों में बसे मोहली समुदाय के लोग आजादी के छह दशक बाद भी अपनी किस्मत का रोना रो रहे हैं. उन्हें अपने धंधों को बढ़ाने के लिए कोई सरकारी सहायता नहीं मिलती है.
वे किसी तरह अपने परिवार का भरण-पोषण करते हैं. लेकिन आज के आधुनिक परिवेश में इनका धंधा समाप्ति की ओर पहुंच रहा है. साथ ही अब इस धंधे में पहले की तरह आमदनी भी नहीं है कि परिवार का भरण-पोषण आसानी से किया जा सके.
नतीजतन वे अपनी आने वाली पीड़ियों को इस पुश्तैनी धंधे से दूर रखना चाहते हैं. प्रखंड के दतियारपुर गांव के नीलमुनी मोहली व कामनी मोहली तथा धोबना गांव के लखीमुनी मोहली आदि ने बताया कि इस गांव में 25 परिवार मोहली जनजाति समुदाय के लोगों का मुख्य पेशा बांस की टोकरी, सूप, कुला, छाता, डाली, पंखा, चटाई आदि बना कर आसपास गांव तथा हटिया में बेच कर किसी तरह अपनी जीविका निर्वाह कर रहे हैं. गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले को भी सही ढंग से सरकारी लाभ नहीं मिलता है. गरीबी के कारण बच्चों क ो भी समय पर स्कूल नहीं भेज पाता है.
जिस कारण गांव में मोहली समुदाय के एक भी लड़के मैट्रिक पास नहीं है. सरकार द्वारा चलायें जा रहे मनरेगा योजना कार्य भी यहां पर नगण्य रूप से हुआ है. यहां के युवक-युवतियां रोजगार की तलाश में गांव छोड़ कर समय-समय बंगाल काम करने चले जाते हैं. कु ल मिला क र दतियारपुर गांव के मोहली समुदाय विकास की रोशनी से कोसों दूर है. प्रखंड के दुधानी, दुमदुमी, मकरमपुर, दुखियाडीह, निपेनिया, दतियारपुर, पाथरियापाड़ा, कुशबेदिया, धोबना, गोलपुर, पलन, कोलारकोंदा, डिमुडीह, डुमरिया, धरमपुर आदि गांवों के मोहली परिवार के हाल एक ही जैसा है.
