आधुनिकता के दौर में विलुप्त हो गयी मधुपुर की घोड़ा गाड़ी

मधुपुर की घोड़ा गाड़ियां थी सैलानियों के लिए शाही सवारी

बलराम भैया, मधुपुर ; बदलते समय और तकनीक के साथ आदमी की जरूरतें भी बदल जाती है. एक समय में जिस तांगे की सवारी को शाही सवारी माना जाता था. आज आधुनिक वाहनों के सामने वह शाही सवारी मधुपुर से पूरी तरह खत्म हो चुकी है. पहले मधुपुर में 60 से अधिक घोड़ा गाड़ियां चला करती थी. यह घोड़ा गाड़ी खासकर बंगाल से आये सैलानियों के लिए शाही सवारी माना जाता था. चारपहिया वाहनों को छोड़ कर आसपास का इलाके घुमने वाले लोग भी घोड़ा गाड़ी से ही सफर करना पसंद करते थे, लेकिन आज आधुनिकता की दौर में यह पूरी तरह से विलुप्त हो गयी है. शहर में एक भी घोड़ा गाड़ी नहीं बची है. अब घोड़ा को इसके पालकों ने अभाव के दौर में खुला छोड़ दिया है. जो शहर के अलग-अलग मैदान व गलियों में आवारा मवेशियों की तरह चरते व घुमते नजर आ रहे हैं. इनमें तो कुछ घोड़ों को मनचले किस्म के युवाओं ने पकड़ लिया है और वे लोग शोक के लिए जब तब सवारी कर लेते हैं. ये घोड़े अब युवाओं के लिए एक खिलौने के तरह साबित हो रहा है. एक समय में पश्चिम बंगाल के सैलानियों का मुख्य स्थल मधुपुर शहर था. बंगाल के दर्जनों राजा, महाराजा, नवाब व सभ्रांत लोगों का यहां करीब 500 से अधिक अलिशान कोठियां थीं. बंगाल के सैलानी प्रत्येक साल मधुपुर में मौसम परिवर्तन व घुमने के उद्देश्य से आया करते थे और इन्ही घोड़े गाड़ियों की सवारी उनकी पहली पसंद होती थी. बताया जाता है कि पहले मधुपुर को घोड़े गाड़ियों के शहर के रूप में भी जाना जाता था. उस दौर में यहां का सवारी का प्रमुख साधन था. जो मुख्य रूप से रेलवे स्टेशन परिसर व गांधी चौक में हमेशा उपलब्ध रहता था. शहर के कमरमंजिल रोड, केसरगढ़ा मोहल्ला, पनाहकोला व बावनबीघा जैसे मोहल्ले के लोग घोड़ा को सबसे अधिक पाला करते थे और इसका इस्तेमाल घोड़ा गाड़ी के रूप में करते थे. आम से लेकर खास लोग भी इसकी सवारी किया करते थे. दशकों से लोक परिवहन का सबसे प्रमुख घोड़ा गाड़ी ही था. एक दशक पहले तक शहर में दर्जन भर से ज्यादा तांगे नजर आते थे, लेकिन धीरे-धीरे तांगे का क्रेज खत्म हो गया. अब आधुनिक दौर में आटो रिक्शा, इ-रिक्शा, छोटे कार और मोटरसाइकिल ने इसकी जगह ले लिया है. सालों तक घोडे़ के साथी रहे तांगे के मालिक अब अपनी पुराने दौर को याद करके भावुक हो जाते हैं. अब नयी पीढ़ी ने घोड़ा गाड़ी से तौबा कर लिया है. बताया कि इस घोड़ा गाड़ी से युवाओं का मोहभंग हो गया है, लेकिन एक दौर में सवारी का सबसे अहम हिस्सा होता था घोड़ा गाड़ी. यह गाड़ी सिर्फ एक वाहन नहीं था, बल्कि शाही रुतबे, रॉयल सफर और पारंपरिक जीवनशैली का प्रतीक माना जाता था. यही वजह है कि पश्चिम बंगाल के नवाबों, अमीरों और यात्रियों की पहली पसंद तांगा ही था. हाइलार्ट्स : कभी घोड़े से चलने वाली गाड़ियां थी शाही सवारी मधुपुर की घोड़ा गाड़ियां थी सैलानियों के लिए शाही सवारी

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Published by: Balram

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