सिलाई-कढ़ाई कर ग्रामीण महिलाएं हो रही आत्मनिर्भर

सामाजिक बदलाव की ओर हैं गोंदलीटांड़ की ग्रामीण महिलाएं

मधुपुर. प्रखंड क्षेत्र के गोंदलीटांड़ की महिलाएं कभी पायी-पायी के लिए मोहताज थी. पर अब वही महिलाएं अपने परिवार की खर्चे चला रही हैं. बच्चों की पढ़ाई के लिए फीस भी भरती है और अपने मन पसंद सामान भी खरीद रही हैं. ये सब एसएचजी ग्रुप बनाकर कपड़े की कढ़ाई, सिलाई, बुनाई का प्रशिक्षण लेने के बाद संभव हुआ. बताया जाता है कि गांव की अधिकतर महिलाएं काफी कम पढ़ी लिखी हैं. इसके बाद भी महिलाएं कुछ कर गुजरने की तलाश में थी. इनके उम्मीदों को पंख देने का काम महिला चेतना विकास पर काम करने वाली फुलिन संस्था ने किया. बताया जाता है कि संस्था के सहयोग से ग्रामीण महिलाओं ने शिल्पी स्वयं सहायता समूह का गठन किया. प्रारंभ में इसमें सिर्फ 12 महिला जुड़ी थी. उसके बाद में दर्जनों महिलाओं को जोड़ा गया. संस्था के सहयोग से भारत सरकार के विपणन एवं सेवा विस्तार केंद्र हस्तशिल्प वस्त्र मंत्रालय भारत सरकार के सहयोग से 20-20 महिलाओं के ग्रुप को कपड़े में कढ़ाई, डिजाइन, सिलाई आदि का प्रशिक्षण दिया गया. इसके बाद महिलाओं ने गांव में काम प्रारंभ कर दिया. महिलाओं ने अपने घर परिवार में भी लोगों को काम सिखाया. वहीं, तात्कालीन राज्यपाल सह वर्तमान में देश के राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू 15 मार्च 2016 को गोंदलीटांड़ पहुंची. उन्होंने महिलाओं का काम देखा और उन्हें प्रेरित किया. बताया जाता है कि तकरीबन पौने दो सौ आबादी वाले गांव में सौ से अधिक घरों में आज महिला-पुरुष समेत अन्य सदस्य कपड़े की सिलाई, बुनाई का काम का कर रही है. आज गांव के सिले हुए ठंड व गर्म कपड़े की मांग देवघर, मधुपुर, जामताड़ा, गोड्डा, जमुई, लक्खीसराय, दुमका, झाझा, गिरिडीह आदि कई जगहों में है. महिलाओं में इस बात का संतोष है कि घर के कामों से जब भी फुर्सत मिलता है दो-चार घंटों काम करके 10 से 15 हजार महीना तक महिलाएं कमा लेती है. फिलहाल 100 से अधिक महिलाएं इस काम से जुड कर अपना रोजी रोटी चला रही है. —————– सिले हुए कपड़े की देवघर, मधुपुर, जामताड़ा, गोड्डा, जमुई, लक्खीसराय, दुमका, झाझा, गिरिडीह में मांग है

सामाजिक बदलाव की ओर है गोंदलीटांड़ की ग्रामीण महिलाएं

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Author: BALRAM

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