न दरवाजा, न छत... फिर भी अपना है ये घर, बाबा की राह में कांवरियों की अनोखी परंपरा

कांवरिया पथ पर श्रद्धालु पत्थरों से छोटे घर क्यों बनाते हैं? जानिए इसके पीछे की अनोखी आस्था और परिवार की सुख-शांति से जुड़ी खास मान्यता के बारे में.


देवघर : कंधे पर कांवर... उसमें गंगाजल... जुबां पर बाबा बैद्यनाथ का नाम और आंखों में बाबाधाम पहुंचकर जल चढ़ाने की आस. कांवरिया पथ पर कदम बढ़ाते हजारों श्रद्धालुओं की यात्रा में भक्ति के ऐसे कई रंग दिखाई देते हैं, जिनके बारे में शायद ही कोई जानता हो. कटोरिया से जिलेबिया मोड़ के बीच जंगलों से गुजरते रास्ते में आस्था का ऐसा ही एक अनदेखा रूप नजर आता है.

पत्थरों को जोड़कर बनाते है घर

यहां कई कांवरिये अचानक रास्ते में रुकते हैं. जंगल की जमीन से एक पत्थर उठाते हैं. फिर दूसरा... तीसरा... और देखते-देखते पत्थरों को जोड़कर एक छोटा-सा घर खड़ा कर देते हैं. न दरवाजा, न खिड़की. न कोई नक्शा, न वास्तु. लेकिन कांवरिये के लिए वह सिर्फ पत्थरों का ढेर नहीं, बल्कि उसके अपने घर की एक छोटी-सी तस्वीर होती है.

पत्थरों से बनाते घर, मन में परिवार की खुशहाली की आस

इस परंपरा के पीछे कांवरियों की अपनी आस्था और मान्यता है. उनका विश्वास है कि बाबा बैद्यनाथ की नगरी जाते समय रास्ते में पत्थरों से घर बनाने से अपने घर का सपना मजबूत होता है. परिवार में प्रेम और एकजुटता बनी रहती है. घर में सुख-शांति आती है और बाबा की कृपा से जीवन में खुशहाली आती है. कुशीनगर, उत्तर प्रदेश से आये कमलेश मधेशिया, पप्पू जायसवाल, दुर्गेश, प्रदीप, अंबिका, संतोष जायसवाल और पार्वती भी रास्ते में पत्थरों से घर बनाते दिखे. कमलेश मधेशिया कहते हैं, “बाबा के दरबार जा रहे हैं. रास्ते में अपना घर बनाकर बाबा से प्रार्थना करते हैं कि हमारा घर भी हमेशा बना रहे. परिवार के लोग साथ रहें और घर में खुशहाली बनी रहे. उनके लिए यह कोई औपचारिक पूजा नहीं, बल्कि मन की बात बाबा तक पहुंचाने का अपना तरीका है.

छोटे घर, बड़ी दुआ; हर पत्थर में छिपी एक मनोकामना

कांवरिया पथ पर बने इन पत्थरों के घरों को गौर से देखें तो हर घर की अपनी बनावट है. किसी ने चार-पांच पत्थर इस तरह टिकाये हैं कि वे घर का आकार लेने लगते हैं. किसी ने मिट्टी का सहारा लिया है. किसी ने ऊपर एक छोटा पत्थर रखकर छत का प्रतीक बना दिया है. घर छोटे हैं, लेकिन इनके पीछे की कामनाएं बड़ी हैं. किसी कांवरिये की इच्छा अपना पक्का मकान बनाने की है. कोई अपने परिवार में चल रहे तनाव के खत्म होने की कामना करता है. किसी को बच्चों के बेहतर भविष्य की चिंता है, तो कोई चाहता है कि रोजी-रोजगार के लिए दूर गये परिवार के सदस्य फिर घर लौटें. कई कांवरियों के लिए यह बस एक प्रार्थना है:“बाबा, हमारा घर और परिवार सलामत रखना.

हर पत्थर में परिवार के साथ की कहानी

खगड़िया के राजेश महतो के लिए इन पत्थरों के घरों में परिवार और समाज की पूरी कहानी छिपी है. वह कहते हैं, “एक पत्थर अकेला हो तो सिर्फ पत्थर है. दूसरा उसके साथ जुड़ता है तो दीवार बनने लगती है. कई पत्थर साथ आते हैं तो घर बन जाता है. परिवार भी ऐसा ही है. सब साथ रहें, तभी घर बनता है. बाबा से यही मांगते हैं कि हमारा परिवार भी इन पत्थरों की तरह जुड़ा रहे.” उनकी यह बात इस परंपरा के भाव को शायद सबसे सहज तरीके से समझाती है.

पत्थरों का घर छोड़, कांवरिये आगे बढ़ते हैं दुआ लेकर

कांवरिये कुछ मिनट रुकते हैं. पत्थर चुनते हैं. उन्हें एक-दूसरे के ऊपर जमाते हैं. फिर हाथ जोड़कर कुछ पल खड़े होते हैं और आगे बढ़ जाते हैं. कांवर फिर कंधे पर झूलने लगती है. पैरों की थकान लौट आती है. लेकिन जंगल की मिट्टी पर उनका बनाया छोटा-सा घर पीछे छूट जाता है. बाबा के दरबार में जल चढ़ाने से पहले ही वे अपनी एक प्रार्थना कांवरिया पथ पर छोड़ चुके होते हैं. यात्रा उनके लिए सिर्फ सुल्तानगंज से बाबाधाम तक की दूरी तय करना नहीं रह जाती. रास्ते में पत्थर जोड़ते हुए वे अपने घर, परिवार और भविष्य की भी एक छोटी-सी नींव रख जाते हैं.

न मंत्र, न पूजा-सामग्री; सिर्फ पत्थर और अटूट विश्वास

इस आस्था की खासियत यह भी है कि इसके लिए किसी विशेष पूजा-सामग्री की जरूरत नहीं पड़ती. न कोई पुरोहित होता है, न मंत्रोच्चार. जंगल की जमीन से मिला एक साधारण पत्थर ही इसके लिए पर्याप्त है. एक पत्थर उठाया, मन में इच्छा की और उसे दूसरे पत्थर के साथ जोड़ दिया. कांवरिया आगे बढ़ गया, लेकिन उसकी उम्मीद वहीं रह गयी. यही वजह है कि कांवरिया पथ पर बने ये छोटे-छोटे पत्थर के घर किसी धार्मिक स्थापत्य की तरह नहीं दिखते, फिर भी श्रद्धालुओं के लिए उनका भावनात्मक महत्व बहुत बड़ा है.

हर यात्रा में बनता नया घर, हर पत्थर में नई उम्मीद

कटोरिया-जिलेबिया मोड़ के जंगलों में ऐसे कई छोटे-छोटे पत्थर के घर रास्ते के किनारे दिखाई देते हैं. कुछ पुराने और टूटे हुए हैं, तो कुछ बिल्कुल नये. बारिश और राहगीरों के पैरों से कई घर बिखर जाते हैं. फिर भी अगले दिन कोई दूसरा कांवरिया वहां पत्थर जोड़कर एक नया घर खड़ा कर देता है. जैसे हर यात्रा के साथ उम्मीद की एक नयी कहानी लिखी जा रही हो. इन घरों की कोई रजिस्ट्री नहीं होती, कोई जमीन नहीं होती और कोई मालिक भी नहीं. फिर भी कुछ देर के लिए इन्हें बनाने वाला कांवरिया इन्हें अपना मान लेता है. क्योंकि वह घर जमीन पर नहीं, उसकी कल्पना और आस्था में बनता है.

बाबा की राह में पत्थरों का घर, विश्वास की नींव पर टिकी उम्मीद

सावन में कांवरिया पथ पर लाखों कदम बाबाधाम की ओर बढ़ते हैं. कोई मनोकामना लेकर आता है, कोई धन्यवाद देने, कोई संकट से मुक्ति मांगने और कोई परिवार की खुशहाली के लिए. कटोरिया-जिलेबिया मोड़ के जंगलों में पत्थरों से बनते ये छोटे घर उसी आस्था की एक अनकही भाषा हैं. कांवरिये बाबा को जल चढ़ाने जा रहे हैं, लेकिन रास्ते में एक पत्थर अपने घर के नाम भी रख जाते हैं. शायद यही इस अनदेखी परंपरा का सबसे सुंदर अर्थ है: बाबा के रास्ते में बनाया गया घर पत्थरों से भले बनता हो, उसकी असली नींव विश्वास की होती है.


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By Prabhat khabar news desk

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