झारखंड शोध संस्थान के सचिव उमेश कुमार की रिपोर्ट
World Heritage Day: आज 18 अप्रैल है और आज ही पूरी दुनिया अंतरराष्ट्रीय विरासत दिवस मनाती है, लेकिन झारखंड के देवघर में एक ऐसी ऐतिहासिक धरोहर मौजूद है, जो आज भी उपेक्षा की शिकार है. यह खामोश विरासत 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम यानी ‘गदर’ की यादों को अपने भीतर समेटे हुए है. बाबा नगरी के नाम से प्रसिद्ध देवघर में स्थित यह स्थल न सिर्फ इतिहास का गवाह है, बल्कि उन बलिदानों की कहानी भी कहता है, जिन्हें समय के साथ भुला दिया गया.
रोहणिया आम के पेड़ों पर दी गई थी फांसी
देवघर के रोहिणी क्षेत्र में 16 जून 1857 का दिन बेहद दर्दनाक था. इसी दिन ‘रोहणिया आम’ के पेड़ों पर सलामत अली, अमानत अली और शेख हारून जैसे तीन वतनपरस्तों को अंग्रेजों ने फांसी दे दी थी. इन तीनों ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ विद्रोह किया था, जिसकी सजा उन्हें मौत के रूप में मिली. यह घटना स्थानीय लोगों के दिलों में आक्रोश और प्रतिरोध की भावना भर गई थी.
भारतीय सैनिकों ने लिया बदला
इस क्रूर घटना के बाद भारतीय सैनिकों का गुस्सा फूट पड़ा. 32वीं पैदल सेना के भारतीय जवानों ने 9 अक्टूबर 1857 को लेफ्टिनेंट कूपर और असिस्टेंट कमिश्नर रोलैंड की हत्या कर दी. यह हमला केवल बदले की कार्रवाई नहीं थी, बल्कि यह अंग्रेजी शासन के खिलाफ खुला विद्रोह था. इस घटना ने यह साबित कर दिया कि देवघर भी 1857 की क्रांति में सक्रिय भागीदार था.
ब्रिटिशकालीन कब्रगाह: एकमात्र भौतिक साक्ष्य
देवघर एसडीओ के पुराने बंगले के पीछे स्थित एक छोटी सी कब्रगाह आज भी उस दौर की गवाही देती है. यह वही स्थान है, जहां मारे गए अंग्रेज अधिकारियों को दफनाया गया था. पुरातात्विक दृष्टि से यह कब्रगाह 1857 की क्रांति में देवघर की भागीदारी का एकमात्र भौतिक प्रमाण है. लेकिन विडंबना यह है कि इस ऐतिहासिक स्थल की ओर आज तक गंभीरता से ध्यान नहीं दिया गया.
उपेक्षा और भूल का शिकार विरासत
आजादी के इतने वर्षों बाद भी इस कब्रगाह की स्थिति बेहद दयनीय है. झाड़-झंखाड़, बेतरतीब पेड़ और गंदगी ने इस ऐतिहासिक स्थल को पूरी तरह ढक लिया है. कुछ लोगों ने इसे केवल ‘अंग्रेजों की कब्रगाह’ मानकर नजरअंदाज कर दिया, जबकि यह भारतीय सैनिकों के शौर्य और बलिदान की भी गवाही देती है. यह सोच कहीं न कहीं हमारी ऐतिहासिक समझ पर सवाल खड़े करती है.
इतिहास से सीखने की जरूरत
यह कब्रगाह केवल अंग्रेजों की नहीं, बल्कि उस दौर की पूरी कहानी का प्रतीक है. इसमें महिलाओं और बच्चों की भी कब्रें शामिल हैं, जिनका किसी राजनीतिक संघर्ष से कोई लेना-देना नहीं था. उनकी कब्रों पर लिखे शब्द आज भी भावनाओं को झकझोर देते हैं. ऐसे में इस स्थल की उपेक्षा इंसानियत और इतिहास दोनों के प्रति अन्याय है.
मार्टिलो टावर से तुलना
यदि हम पाकुड़ के मार्टिलो टावर की बात करें, तो वह भी अंग्रेजों द्वारा संताल हूल के दौरान अपने बचाव के लिए बनाया गया था. बावजूद इसके, उसे आज एक ऐतिहासिक धरोहर के रूप में संरक्षित किया गया है. क्योंकि वह 1855-56 के संताल हूल का एकमात्र भौतिक साक्ष्य है. लेकिन देवघर की यह कब्रगाह, जो 1857 के गदर की गवाही देती है, आज भी उपेक्षित है. यह तुलना प्रशासनिक दृष्टिकोण के अंतर को साफ दर्शाती है.
वर्तमान स्थिति: अतिक्रमण और अनदेखी
आज इस कब्रगाह की हालत और भी चिंताजनक हो गई है. यहां चारकोल के ड्रम फेंक दिए गए हैं और आसपास के क्षेत्र को इस तरह घेर दिया गया है कि इसकी पहचान करना भी मुश्किल हो गया है. झाड़ियों और पेड़ों ने इसकी मूल संरचना को पूरी तरह छिपा दिया है. हैरानी की बात यह है कि इस ऐतिहासिक स्थल के आसपास कई अधिकारियों के आवास मौजूद हैं, फिर भी इसकी सुध लेने वाला कोई नहीं.
संरक्षण की जरूरत और जिम्मेदारी
देवघर की यह खामोश विरासत केवल अतीत की कहानी नहीं, बल्कि हमारी पहचान का हिस्सा है. यदि इसे समय रहते संरक्षित नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियां इस महत्वपूर्ण इतिहास से वंचित रह जाएंगी. जरूरत है कि प्रशासन, इतिहासकार और स्थानीय लोग मिलकर इस स्थल को संरक्षित करें और इसे एक ऐतिहासिक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करें.
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इतिहास को बचाना हमारी जिम्मेदारी
1857 के गदर की यह अनसुनी कहानी हमें यह याद दिलाती है कि आजादी की कीमत कितनी बड़ी थी. देवघर की यह कब्रगाह न केवल शहादत की प्रतीक है, बल्कि यह हमें अपनी विरासत को सहेजने का संदेश भी देती है. अगर हमने अब भी इसे नजरअंदाज किया, तो इतिहास हमें कभी माफ नहीं करेगा.
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