देवघर.बाबा बैद्यनाथ धाम की पहचान केवल ज्योतिर्लिंग और मंदिर की भव्यता तक सीमित नहीं है. यहां की हर परंपरा अपने भीतर गहरी धार्मिक आस्था और पौराणिक मान्यताओं को समेटे हुये है. मंदिर परिसर में बाबा बैद्यनाथ और मां पार्वती के मंदिरों के शिखरों को आपस में जोड़ता लाल धागा इसी अनूठी परंपरा का प्रतीक है. दूर से देखने पर यह धागा भले ही साधारण नजर आये, लेकिन श्रद्धालुओं के लिए यह शिव और शक्ति के अटूट संबंध का जीवंत प्रतीक है.
लाल धागा भगवान शिव और माता पार्वती के दांपत्य व आध्यात्मिक मिलन
मान्यता है कि बाबा बैद्यनाथ मंदिर और मां पार्वती मंदिर के शिखरों के बीच बंधा यह पवित्र धागा भगवान शिव और माता पार्वती के दांपत्य एवं आध्यात्मिक मिलन को दर्शाता है. यही कारण है कि देवघर आने वाले श्रद्धालु इस परंपरा को विशेष श्रद्धा की दृष्टि से देखते हैं. सावन के महीने में जब लाखों कांवरिया बाबा पर जलार्पण के लिए पहुंचते हैं, तब मंदिर के शिखरों के बीच दिखाई देने वाला यह लाल धागा आस्था के इस केंद्र की विशिष्ट पहचान बन जाता है.
देवघर की धार्मिक संस्कृति में शिव और शक्ति एक दूसरे के पूरक
देवघर की धार्मिक संस्कृति में शिव और शक्ति को एक-दूसरे का पूरक माना गया है. बाबा बैद्यनाथ जहां भगवान शिव के रूप में पूजे जाते हैं, वहीं मां पार्वती शक्ति स्वरूपा हैं. दोनों मंदिरों के शिखरों को जोड़ता धागा इसी सनातन भाव को प्रतीकात्मक रूप से अभिव्यक्त करता है.
लाल धागा विश्वास, प्रेम व समर्पण का है प्रतीक
श्रद्धालुओं के लिए यह धागा महज एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि विश्वास, प्रेम, समर्पण और अनंत बंधन का संदेश है. बाबा बैद्यनाथ धाम में आस्था के ऐसे अनेक प्रतीक हैं, जो सदियों से चली आ रही परंपराओं को आज भी जीवंत बनाये हुए हैं. यही विशेषताएं देवघर को देश के प्रमुख तीर्थस्थलों में अलग पहचान देती हैं.
